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रविवार, 24 मार्च 2013

पत्थर

- प्रकाश साहू ' वेद ' -
इसकी ठोकर खायी मैंने
उसकी ठोकर खायी।
भड़का नहीं, तड़का नहीं,
मूर्ति बन गया भाई।

लोग छुड़ाते थे पाँव की मिट्टी
जब यूं पड़ा था रास्ते में।
उधर से एक पारखी गुजरा,
बाँध लाया बस्ते में।

छिनी - हथौड़ी रोज चलाया,
ईश्वर का आकार दिया।
अब होती मंदिर में पूजा,
उस सज्जन ने मुझे तार दिया।

अचरज मुझको तब होता है,
जब लोग तारने कहते हैं।
मेरे दर्शन की खातिर ये,
जाने कितने दु:ख सहते हैं।

भाव - पुष्प की संगति पा मैंने
मूल स्वभाव को तज दिया।
पत्थर से ईश्वर बन कर,
भक्तों को ही भज दिया।
                पता - जंगलपुर, तहसील - डोंगरगांव,
                    जिला - राजनांदगांव (छ.ग.)

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