इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

शुक्रवार, 29 मार्च 2013

चंदा लुकागे


  • पुरूषोतम साहू

देख तो कान्हा बादर मं चंदा ह लुकागे
अब तो जावन दे मोला रतिहा अबबड़ होगे

    अभी - अभी आय  हवस, अभी चले जाबे
    काबर राधा तंय  मोला अकेल्‍ला छोड़ जाबे

घबरावत मन धरकत हे छाती मोर
काली फेर आहूं कहत हंव हाथ जोर

    जब भी तंय  आथस, जल्दी चल देथस
    अइसन तंय  काबर मोला तरसाथस

चले आथय  मंय  सुने ल  बंसी के धुन ला
रहिथे अबबड़ बूता करे बर घर मा

    कब पाबे तंय  छुटकारा बुता ले
    बता का काम होथय  बड़े मोर ले
मु,पो. बरोली
व्हाया - बसना
जिला महासमुन्द (छग)

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