इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शुक्रवार, 29 मार्च 2013

बेटों वाला बाप

कहानी


  • गिरीश बख्शी
देखते ही देखते भीड़ एकत्रित हो गई.बूढ़े दीनदयाल बाबू अब भी हांफ रहा था.उनकी छड़ी दूर जा गिरी थी और पूड़ा खुल जाने से सेव चूड़ा जमीन पर बिखर गये थे.कोई बोल उठा था - नहीं !! नहीं !! चिन्ता की कोई बात नहीं.दादाजी को खरोंच  तक नहीं आयी.वो तो अच्छा हुआ प्रकाश ने ठीक समय  पर उन्हें खींच  लिया नहीं तो जीप वाला..... ?'' 
- नहीं तो क्‍या होता भाई ?'' दीनदयाल ने जाने कैसी तो भर्राई आवाज में कहा - इस बेकार बूढ़े को हमेशा के लिए शांति मिल जाती.वही सबसे अच्छी बात होती .''
प्रकाश ने उनकी छड़ी उन्हें देते हुए कहा - नहीं, दादाजी नहीं, आप हमेशा ये मरने - मरने की बातें क्‍यों करते हैं ? हम लोग तो आपके पास ही हैं.जब कोई जरूरत हो हमें बता भर दीजिए.आप इतने निराश न हों.आइए, यहां प्लेटफार्म पर बैठिए. मैं सेव चूड़ा लेकर आता हूं.''
दुबले - पतले ठिगने कद के छोटे से आदमी दीनदयाल बाबू.झूरीर्दार गोल चेहरे पर बुझी - बुझी सी उनकी आंखें, आंखों पर लगा मटमैला फ्रेम का चश्मा, लगता था कि अब गिरा, तब गिरा.वे अपने बायें हाथ से चश्में को बार - बार नाक पर जमाते.धूल - धूसरित उटंग धोती, उस पर कभी नीले रंग की कमीज तो कभी सिर्फ बंडी पहने दिखाई पड़ते. पैरों में वेल्डिंग की गई प्लास्टिक की चप्पलें अटकी रहती, तो कभी कैनवास के लाल जूतों से उनके अंगूठे झांकते नजर आते.लेकिन हर समय उनके हाथ में एक आकषर्क छड़ी जरूर रहती.बाजार लाइन की व्यस्त सड़क पर अक्‍सर वे धीरे - धीरे आते - जाते दिखाई देते.चलते - चलते वे अचानक रूक जाते,एकदम चुप खड़े हो जाते,नाक पर अटका चश्मा ठीक करते, सिर को उठाकर मिच मिचाती आँखों से देखते, भर आयी सांस के सामान्य  हो जाने पर वे फिर धीरे - धीरे चलने लगते.उनके हाथ में कोई न कोई पूड़ा या पैकेट जरूर होता जो किराना सामान या सेव - चूड़ा का होता.इस बात से उन्हें बड़ी राहत मिलती कि अब किराना दुकानो में भी नमकीन मिक्‍चर मिलने लगा है.हम बूढ़ों के लिए ही शायद किराना वालों ने यह सुव्यवस्था कर दी है नहीं तो मैं बूढ़ा सिनेमा चौक तक कैसे जा सकता था ? बुढ़ापे में हर समय  सचमुच  कुछ न कुछ खाने की इच्छा होती है. पेट तो पचा नहीं पाता,पर मन को क्‍या करें ? घर में बहू होती तो तरह - तरह के व्यंजन बना - बनाकर खिलाती और तबियत बिगड़ने पर दवा - दारू भी करती पर अब तो घर में कोई नहीं है.लड़के सब अपने - अपने बाल - बच्‍चों के साथ नौकरी - चाकरी में बाहर चले गये हैं और उस पुरखौती मकान में बच  रह गये है सिर्फ दो प्राणी, एक वे और एक उनकी जीवन संगिनी- बड़े की अम्मा.बड़े की अम्मा भी ऐसी कि जनम की बीमार.इस बुढ़ापे में किसी तरह रो धोकर दो जून दाल - भात बना लेती है.खाँसते - खाँसते जब कभी उसका दम उखड़ने लगता है और वह बेसुध हो जाती है तो खुद दीनदयाल बाबू चूल्हे पर चांवल चढ़ा देते हैं और भात के साथ सेव - चूड़ा मिला कर खा लेते और बड़े की अम्मा को भी खिला देते .दोपहर को बड़े की अम्मा आंगन की आधी धूप, आधी छाँव में बैठी - बैठी चांवल से कंकड़ चुनती, आटे से कीड़े निकालती या चने की भाजी तोड़ती.तब दीनदयाल बाबू सामने दरवाजे पर की आराम - कुर्सी पर आराम से बैठकर अतीत से बातें करने लग जाते.
बड़ा लड़का सन 35 में हुआ था या 34 में.. शायद 34 में ही हुआ था... कुछ ठीक याद नहीं आ रहा.वे पूछ उठते - बड़े की अम्मा, जरा बताओ तो अपना बड़ा किस सन में हुआ था ?'' पर उधर से कोई जवाब नहीं आता.वे जोर से पूछ बैठते - अरे, तुमने सुना नहीं क्‍या ? पूछ रहा था बड़े का जनम... वे आंगन की ओर देखते. उनका हृदय  स्नेह और सहानुभूति से भर उठता.बड़े की अम्मा आंगन में ही गुड़ीमुड़ी हो सो चुकी होती.
आज जब वे बानी बाबू के ऊंचे प्लेटफार्म पर बैठे - बैठे प्रकाश की राह देख रहे हैं तो उन्हें फिर बड़े बेटे का जन्म दिन याद आ गया....।
सन 34 का साल हो या 35 का, पर बड़ा लड़का जब हुआ था तो पूरा घर जैसे जगमगा गया था.राजमहल से बड़े दाऊजी खुद आये थे.प्राय मरी स्कूल में एकाध साल कभी पढ़े थे - दाऊ घनश्याम शरणदास.फिर दाऊजी राजकुमार कालेज में पढ़ने च ले गये थे.इतने बड़े दाऊजी ने उनसे लिपट कर कितनी बधाई दी थी.खूब उत्साह से कहा था - ठहरो ! ठहरो, बाजे वालों को रूकने को बोलो दीनदयाल.पहले बंदूक छूटेगी, फिर बाजा बजेगा.और उन्होंने खुद बंदूक छोड़ी थी...दन्‍न दन्‍न दन्‍.. तीन बार. लगता है, यह सब कल की ही बात है.दाऊजी अब नहीं रहे.बड़ा भी अब कितना बड़ा हो गया - बाल बच्‍चेदार, पक्‍के गृहस्थ.
एक दिन जब उन्हें किसी की बात से चोट पहुंची थी, उन्होंने बड़े को पत्र लिखा था. जवाब तीसरे चौथे दिन आ गया था - बाबू जी मैं आप लोगों को यहां ले तो आता, पर घर बहुत छोटा है.समझ लीजिए - अपना गाय  कोठा जितना है.हमीं लोगों को तकलीफ होती है. फिर घर बस्ती से काफी दूर है और आस - पास कोई डाँक्‍टर बैद्य भी नहीं रहते.अम्मा को बीमारी उठने से परेशानी हो जायेगी. मैं रूपया भेज रहा हूं आपकी टानिक और अम्मा की दवा के लिए...।
बड़े बेटे पर उन्हें बड़ा भरोसा था.वे दोनों खुशी खुशी अपना सामान बांध - बूंध कर बड़े के घर जा पहुंचे थे.सोचा था - घूमने फिरने से मन बहलेगा और हवा बदलेगी तो बड़े की अम्मा की तबियत भी सुधरेगी और सबसे बड़ा कारण यह था कि बड़े की अम्मा को सुनसान घर काटने को दौड़ता था.एकाकी जीवन से वह उकता चुकी थी.दरअसल वह दादी का गौरव प्राप्‍त करना चाहती थी.बड़े के बच्‍चे को गोद में लेकर उन्हें दिन रात खिलाना - झूलाना चाहती थी,बेचारी बड़े की अम्मा बड़े, मंझले, छोटे और नन्हें उसके खुद के चार बेटे. जब वे छोटे छोटे थे तो अपने सास ससुर के लिहाज के कारण वह उन्हें गोद में नहीं ले सकती थी.प्यार से चूम पुचकार नहीं सकती थी.कभी वह फुरसत के समय अपने किसी बच्‍चे को छाती से लगाये दुलार रही होती कि ससुर के अचानक कमरे की ओर आने या खंखार सुनकर वह डर के मारे ऐसी सहम जाती मानो चोरी करते पकड़ी गई हो.अब जबकि वह खुद सास हो गई तो अपने नाती नातिन को अधिकार पूवर्क बेहिचक गोद में लेकर स्नेह - प्रेम से चूम - चूम कर मगन हो जाना चाहती थी.
घर से उस दिन वे कितनी आशा, कितना उत्साह ले कर निकले थे, पर बड़े के दरवाजे पर पैर रखते ही बेटे और बहू के बूझे - बूझे चेहरे को देख उनका सारा उत्साह मर गया था.बड़े बेटा तो जैसे डर गया था - अरे, बाबूजी ! आप ? आप दोनों अचानक ? मैंने तो.. मैने तो पत्र लिख दिया था. रूपये भी भेजे थे... नहीं मिले क्‍या ?'' और चौखट पर ही जो आघात लगा था वह भीतर पहुंचने पर बढ़ता ही गया.बूढ़े दीनदयाल बाबू बड़े की अम्मा की खातिर सब कुछ सह रहे थे, पर एक दिन जब बड़े की अम्मा भी कह उठी - बड़े के जनम दिन पर राजमहल के बड़े दाऊजी ने बंदूक चलायी थी, तो मेरी छाती गर्व से फूल उठी थी और बड़ी बहू तो रोज - रोज गोली चलाकर मेरी छाती को छलनी किये दे रही है.क्‍या अब भी अपने घर नहीं चलोगे.... ?''
फिर वे पहली गाड़ी से ही भूखे - प्यासे अपने घर लौट आये थे.
दीनदयाल को उसी दिन अपने दूसरे लड़के की याद आई थी.दूसरा लड़का - वह तो बस गया है दूर पहाड़ी लंका में.इस बूढ़ापे में यहां की ठंड तो बर्दाश्‍त होती नहीं तो वहां तो हडिड्यां कड़कड़ाती ठंड में टुकड़े - टुकड़े हो बिखर जायेंगी.साल दो साल में कभी - कभी वह आता है.हाल - चाल पूछपाछ कर चला जाता है.नौकरी उसकी सबसे अच्छी है और इसी कारण उसके बाल बच्‍चे भी अधिक हैं.यहां जब कभी वह अपने परिवार सहित आता तो उन्हें बड़ी तकलीफ होती है.दूसरे - तीसरे दिन से उनका सबका मन भगने - भगने को होने लगता है.पहाड़ी इलाके की बहू को इस घर में जाने कैसी तो बास आती है, उसका चौबिसों घंटे सिर दर्द करते रहता है.उनका सबसे छोटा मुन्‍ना गोरा - गोरा गोल मटोल गोलू कह उठता है - दादा गंदे, दादी गंदी.ये घर भी गंदा.तलो न मम्मी अपने अच्छे घर में...।''
दीनदयाल बाबू एक जोरदार जम्हाई लेकर कह उठे - हे राम ! अब तीसरे बेटे से क्‍या आशा करें ? वो तो अपने ससुराल में रहता है.उसे शर्म भी नहीं लगती.हर साल लिखता है - मैं यहां बड़े में हूं.अब की दीवाली के बाद मैं अच्छा सा मकान खोजूंगा और आप लोगों को वहां ले आऊंगा.आप लोगों को वहां कितनी तकलीफ है - यह मैं जानता हूं.पर अपने इस तीसरे बेटे को पिछले बेटे को पिछला सात सालों से कोई अच्छा मकान नहीं मिल रहा है.बड़े की अम्मा कभी कभी चिढ़कर कह उठती - तुम हाऊसिंग बोर्ड को क्‍यों नहीं लिखते जी.हमारा बेटा बेचारा ससुराल में दुख भोग रहा है,उसके लिए वे लोग कम से कम एक मकान तो बनवा दें...।
दीनदयाल बाबू,बानी बाबू के प्‍लेटफार्म‍ पर बैठे बैठे आज भी हंस पड़े.वैसे वे बड़े की अम्मा से मुसकरा कर कहा करते - तुम्हें अपने तीसरे बेटे से बड़ी चिढ़ है न ? अपना चौथा बेटा नन्हें देखना, एक दिन वही हमारा सुध लेगा ?''
बड़े की अम्मा मारे क्रोध के उबल पड़ती - वो नन्हें, तुम्हारा नकारा आवारा बेटा,और वो हमारा सुध लेगा ? ऊंह...।
दीनदयाल बाबू चुप रह जाते.चौथा बेटा तो सचमुच  सबसे अलग - थलग अपने में मस्त अलमस्त है.शादी उसने की नहीं.घर का भी कोई ठीक - ठिकाना नहीं.आज यहां तो कल जाने कहां ?किसी ने उन्हें बताया था कि नन्हें ने नौकरी भी अपनी प्रकृति के अनुरूप ढ़ूंढ़ ली - टूरिंग जाँब.किसी दवा कंपनी का एजेंट हो गया है.एक बार वह कश्मीर गया था तो वहां जाने कैसे अपने बाबू जी की याद हो आयी थी और खरीद लाया था वह उनके लिए एक खूबसूरत छड़ी.चौथे बेटे ने घर आकर उनके सामने छड़ी घुमाते हुए कहा था - बाबूजी, इस मजबूत छड़ी को मैंने खासतौर से आपके लिए ही खरीदा है.आपको मालूम,इससे बढ़िया छड़ी पूरे कश्मीर में नहीं है.देखिए, न मत कहिए.समय  को देखिए ? अब आपकी उमर हो गयी है.आपको सहारे की जरूरत है
पता नहीं नन्हें आज किस शहर मे होगा.वर्षो  से उसकी कोई खबर नहीं मिली है.फिकर तो उसने कभी किसी बात की नहीं.बच पन से ही वह बड़ा लापरवाह रहा है.
दीनदयाल बाबू को चिंता हुई - पता नहीं उस घुम्‍मकड़ बेटे को हमारे मरने की खबर लग पायेगी भी या नहीं ? वे एकाएक गहरी सांस भर कर व्याकुल हो उठे.बुदबुदाने लगे - कैसा था मैं ? कैसा था अपना घर ? और अब कैसे हो गया हूं मैं - दीनहीन बेबस, और अपना घर हो गया है निजर्न - बेजान .
इतने में प्रकाश सेव चूड़ा लेकर आ गया.वह ठिठक गया.देखा - दीनदयाल बाबू धीर गंभीर बुत सी गुपचुप बैठे हैं.वह कह उठा -दादी जी उठिए, घर चलिए शाम हो रही है.
दीनदयाल बाबू ने अचानक बड़े जोर से प्रकाश का हाथ पकड़ लिया.रो से पड़े - प्रकाश, बोल तो तू, तू मेरा बेटा क्‍यों नहीं हुआ रे ?
प्रकाश घबरा सा गया.फिर सम्हलकर बोला - ऊंह, छोड़िए दादाजी,यह सब उलूल - जलूल मत सोचिए. जो सामने है उसको देखिए.कवि मत बनिए.
- नहीं रे प्रकाश... दीनदयाल बाबू भर आये गले से बोल उठे - तू मेरा बेटा होता तो सच कहता हूं आज मैं इतना असहाय  नहीं होता.
प्रकाश - छब्‍बीस वर्ष का युवक प्रकाश तब उत्तेजित हो उठा.कड़वे स्वर मे बोला - तो सुनिए दादाजी,तब आपके चार नहीं पांच  बेटे होते और आपका यह पांच वा पुतर भी नौकरी और औरत के चक्‍कर में फंसकर कहीं दूर चला गया होता.यह अच्छा है कि मैं आपका लड़का नहीं हुआ.चलिए, जल्दी घर चलिए.अंधेरा घिर रहा है.
दीनदयाल बाबू भौचक्‍क प्रकाश को देखते रह गये.

ब्राम्‍हाण पारा,राजनांदगांव (छग)   

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