इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

रविवार, 24 मार्च 2013

यूरोपीय काव्यदृष्टि की सरल व्याख्या - पाश्चात्य काव्य - दर्शन


 समीक्षक - डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी -
भारतीय काव्यशास्त्र की चिंताधारा में काव्यगत रस और उसके साधारणीकरण से जुड़ी समस्याएं संकेन्द्रित रही है, जबकि पाश्चात्य काव्यचिंतको ने अधिकतर काव्य के स्वरुप पर चर्चा की है। डाँ. शंकर मुनि राय की नई पुस्तक पाश्चात्य काव्यदर्शन में पश्चिम के सभी प्रमुख काव्यचिंतकों की विचारधारा में मौजूद इसी समस्या पर विवेचन उपलब्ध है। कि कविता क्या है? अथवा कैसी होनी चाहिए। अपनी विवेचना के लिए लेखक ने पाश्चात्य काव्यशास्त्र पर हिन्दी में प्रकाशित लगभग सारी सामाग्री का अनुशीलन किया है और मूल अंग्रेजी पुस्तकों  की सहायता भी ली है। तभी उनके विश्लेषणों में प्लेटो, अरस्तू, लॉजाइनस, हॉरेस,ड्रायडन, कॉलरिज, जॉनसन, वर्डसवर्थ, मैथ्यू ऑरनॉल्ड, इलियट और रिचर्डस की काव्य मान्यताएं बहुत ही पारदर्शी तौर पर छन कर सामने आई है। ऊपरी तौर पर पाश्चात्य काव्य दर्शन विद्यार्थियों के हितार्थ तैयार कृति नजर आती है, लेकिन वास्तव में डॉ. शंकर मुनि राय का निहितार्थ यूरोपीय काव्यचिंतन का समेकित विश्लेषण रहा है।
पुस्तक का नाम पाश्चात्य काव्य चिंतन होना चाहिए था। इसे पाश्चात्य काव्य दर्शन कहने से एक ओर दार्शनिकता की गंध आती है और दूसरी ओर यूरोपीय काव्यशास्त्रियों के गैरदार्शनिक आचरण का निषेध होता है। छोटे - छोटे उपशीर्षकों, अनुच्छेदों में विभक्त सामग्री को डॉ. शंकर मुनि राय बहुत ही सहजतापूर्वक सहझाया है। इससे पाश्चात्य काव्य शास्त्र के प्रमुख हस्ताक्षरों की काव्यधारणा पूरी तरह उजागर हुई है। अपनी ओर से कोई निष्कर्षात्मक टिप्पणी देने से लेखक ने अधिकतर परहेज किया है,लेकिन सभी यूरोपीय काव्यचिंतकों के व्यक्तित्व और अवदान की संक्षिप्त झांकी अवश्य दी है। अपनी संक्षिप्त भूमिका में उन्होंने यूनान के पिंडार, गार्गियस, अरिस्तोफेनिस की चर्चा हिन्दी पाठकों के लिए एक नई जानकारी के तौर पर की है। यही देमेत्रियस का उल्लेख भी होना चाहिए था। पाश्चात्य काव्य दर्शन अपनी सीमा में पश्चिमी काव्यचिंतन का स्पष्ट और बेबाक भाषा में किया गया विवेचन है। इस संक्षिप्त प्रस्तुति के लिए डॉ. शंकर मुनि राय बधाई के पात्र है।
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