इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

सोमवार, 25 मार्च 2013

झलमला

जन्म - 27 मई, 1894
राजनांदगांव, (छत्तीसगढ़) भारत
मृत्यु- 18 दिसंबर 1971
रायपुर, (छत्तीसगढ़) भारत
                                                                                                                        - पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी  -
मैं बरामदे में टहल रहा था। इतने में मैंने देखा कि विमला दासी अपने आँचल के नीचे एक प्रदीप लेकर बड़ी भाभी के कमरे की ओर जा रही है। मैंने पूछा-क्यों री, यह क्या है ? वह बोली- झलमला।'' मैंने फिर पूछा- इससे क्या होगा ?'' उसने उत्तर दिया - नहीं जानते हो बाबू, आज तुम्हारी बड़ी भाभी पंडितजी की बहू की सखी होकर आई हैं। इसीलिए मैं उन्हें झलमला दिखाने जा रही हूँ।'' तब तो मैं भी किताब फेंककर घर के भीतर दौड़ गया। दीदी से जाकर मैं कहने लगा- दीदी, थोड़ा तेल तो दो।'' दीदी ने कहा- जा, अभी मैं काम में लगी हूँ।'' मैं निराश होकर अपने कमरे में लौट आया। फिर मैं सोचने लगा - यह अवसर जाने न देना चाहिए। अच्छी दिल्लगी होगी। मैं इधर - उधर देखने लगा। इतने में मेरी दृष्टि एक मोमबत्ती के टुकड़े पर पड़ी। मैंने उसे उठा लिया और एक दियासलाई का बक्स लेकर भाभी के कमरे की ओर गया। मुझे देखकर भाभी ने पूछा - कैसे आए बाबू ?'' मैंने बिना उत्तर दिए ही मोमबत्ती के टुकड़े को जलाकर उनके सामने रख दिया। भाभी ने हँसकर पूछा- यह क्या है ?''
मैने गंभीर स्वर में उत्तर दिया- झलमला।''
भाभी ने कुछ न कहकर मेरे हाथ पर पाँच रुपए रख दिए। मैं कहने लगा- भाभी, क्या तुम्हारे प्रेम के आलोक का इतना ही मूल्य है ?'' भाभी ने हँसकर कहा- तो कितना चाहिए ?'' मैंने कहा- कम से कम एक गिनी।'' भाभी कहने लगी- अच्छा, इस पर लिख दो। मैं अभी देती हूँ।''
मैंने तुरंत ही चाकू से मोमबत्ती के टुकड़े पर लिख दिया - मूल्य एक गिनी।'' भाभी ने गिनी निकालकर मुझे दे दी और मैं अपने कमरे में चला आया। कुछ दिनों बाद गिनी के खर्च हो जाने पर मैं यह घटना बिलकुल भूल गया।
आठ वर्ष व्यतीत हो गए। मैं बी.ए.एल.एल.बी.होकर इलाहाबाद से घर लौटा। घर की वैसी दशा न थी जैसे आठ वर्ष पहले थी। न भाभी थी और न विमला दासी ही। भाभी हम लोगों को सदा के लिए छोड़कर स्वर्ग चली गई थीं,और विमला कटंगी में खेती करती थी। संध्या का समय था। मैं अपने कमरे में बैठा न जाने क्या सोच रहा था। पास ही कमरे में पड़ोस की कुछ स्त्रियों के साथ दीदी बैठी थीं। कुछ बातें हो रही थीं। इतने में मैंने सुना- दीदी किसी स्त्री से कह रही हैं-कुछ भी हो, बहन मेरी बड़ी बहू घर की लक्ष्मी थी।''
उस स्त्री ने कहा- हाँ बहन ! खूब याद आई, मैं तुमसे पूछनेवाली थी। उस दिन तुमने मेरे पास सखी का संदूक भेजा था न।''  दीदी ने उत्तर दिया - हाँ बहन, बहू कह गई थी कि उसे रोहिणी को दे देना।'' उस स्त्री ने कहा- उसमें सब तो ठीक था, पर एक विचित्र बात थी।'' दीदी ने पूछा- कैसी विचित्र बात ?'' वह कहने लगी- उसे मैंने खोलकर एक दिन देखा तो उसमें एक जगह खूब हिफाजत से रेशमी रूमाल में कुछ बँधा हुआ मिला। मैं सोचने लगी- यह क्या है। कौतूहलवश उसे खोलकर मैंने देखा। बहन, कहो तो उसमें भला क्या रहा होगा ?'' दीदी ने उत्तर दिया- गहना रहा होगा।''  उसने हँसकर कहा- नहीं, उसमें गहना न था वह तो एक अधजली मोमबत्ती का टुकड़ा था और उस पर लिखा हुआ था - मूल्य एक गिनी। क्षण भर के लिए मैं ज्ञानशू्न्य हो गया, फिर अपने हृदय के आवेग को न रोककर मैं उस कमरे में घुस पड़ा और चिल्लाकर कहने लगा - वह मेरी है। मुझे दे दो।'' कुछ स्त्रियाँ मुझे देखकर भागने लगीं। कुछ इधर - उधर देखने लगीं। उस स्त्री ने अपना सिर ढाँकते - ढाँकते कहा - अच्छा बाबू, मैं कल उसे भेज दूँगी।''
पर मैंने रात को एक दासी भेजकर उस टुकड़े को मँगा लिया। उस दिन मुझसे कुछ नहीं खाया गया।
पूछे जाने पर मैंने कहकर टाल दिया कि सिर में दर्द है। बड़ी देर तक मैं इधर - उधर टहलता रहा। जब सब सोने के लिए चले गए, तब मैं अपने कमरे में आया। मुझे उदास देखकर कमला पूछने लगी- सिर का दर्द कैसा है ?'' पर मैंने कुछ उत्तर न दिया। चुपचाप जेब से मोमबत्ती को निकालकर जलाया और उसे एक कोने में रख दिया।
कमला ने पूछा- यह क्या है ?''
मैंने उत्तर दिया- झलमला।''
कमला कुछ न समझ सकी। मैंने देखा कि थोड़ी देर में मेरे झलमले का क्षुद्र आलोक रात्रि के अनंत अंधकार में विलीन हो गया।

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