इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

शनिवार, 30 मार्च 2013

कौन करे आभार व्यक्‍त, प्रकाशक संपादक या लेखक ?


मन खिन्‍न था.समझ से परे था कि किस विषय  पर इस बार की सम्पादकीय  लिखा जाये.सम्पादकीय  से ही सम्पादक की महत्ता समझ आती है इसमें संदेह नहीं इसलिए संपादक सदैव कोई ऐसी संपादकीय  लिखना चाहता है जिस पर पाठक वर्ग चिंतन - मनन कर सके.
संपादकीय  लेखन पर विचार कर ही रहा था कि डाकिया ने एक पत्र लाकर दिया.पत्र गुरूर से आया था और उस पत्र को प्रेषित किए थे कहानीकार भावसिह हिरवानी. पत्र पढ़ने के बाद मुझे लगा इस पर ही क्‍यों न संपादकीय  लिख लिया जाये. पत्र लिखा गया था कि  विचार वीथी का पहला अंक मिला. आपने पत्रिका में मेरी कहानी प्रकाशित की उसके लिए  मैं हृदय  से आभारी हूं.आपने डाँ महमल्‍ल की कविता प्रकाशित की उसके लिए धन्यवाद. पर प्रश्न यह उठता है कि क्‍या सिर्फ और सिर्फ संपादक व प्रकाशक ही धन्यवाद के अधिकारी होते हैं.क्‍या सिर्फ और सिर्फ लेखक ही आभारी हो सकते हैं. क्‍या प्रकाशक संपादक का दायित्व नहीं बनता कि हम उन लेखकों को ही क्‍यों न हृदय  से आभार व्यक्‍त करें जिनकी रचना शैली के बदौलत हमारे द्वारा प्रकाशित पत्र - पत्रिका में जान आती है.वह पठनीय  बन पाती है.आभार तो संपादक प्रकाशक को रचनाकार का व्यक्‍त करना चाहिए मगर ऐसा होता कहां हैं.संपादक प्रकाशक तो मात्र किसी रचनाकार की रचना प्रकाशित कर ऐसा महसूस करते हैं मानों वे  रचनाकार पर एहसान कर दिये मगर सत्य  यह है कि  पत्र - पत्रिका की  महत्ता रचाकार की मेहनत, उसकी लेखनीय  शैली, उनके विचार से बढ़ती - घटती है.किसी भी पत्र पत्रिका में चार चांद लगाने का कोई काम करता है तो वह है रचनाकार की रचना. 
इस अंक के संपादकीय  से कुछ पत्र - पत्रिकाओं के संपादकों - प्रकाशकों को उजर हो सकती है मगर इसकी चिंता कतई नहीं.वास्तव में देखा जाये तो संपादकों प्रकाशकों को उन रचनाकारों का हृदय  से आभारी होना चाहिए जिनकी लेखनीय  ताकत के बदौलत प्रकाशित पत्र - पत्रिकाओं का महत्व बढ़ जाता है.
अगस्‍त 2007

                        संपादक

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