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शुक्रवार, 29 मार्च 2013

'' निश्‍छल '' के दो गीत


काबर करम ले भागथस जी
विटठल राम साहू '' निश्‍छल ''
 विटठल राम साहू '' निश्छल''
करम करे ले सुख मिलही गा,
काबर तंय  ओतियाथस जी
मेहनत के धन पबरीत भईया
बिरथा काबर लागथे जी ।


    रात दिन तंय  जांगर टोर,
    तंय  चैन के बंसी बजाबे जी
    करम के खेती ल करके भइया
    भाग ल काबर रोथस जी,


करले संगी तंय  मेहनत ल
काबर दिन ल पहाथस जी
मेहनत ले हे भाग मुठा म
बिरथा काबर लागथे जी ।


    गेये बेरा बहुरे नई संगी
    नई पावस तंय  काली लग
    समें झन अबिरथा होवय
    मुड़ धर के पसताबे जी ।


झन पछुआ तंय  काम - बुता म 
बेरा ल देख ढ़रकत हे जी
समे संग तंय  दउड़ भईया
अबिरथा काबर लागथे जी ।।
2
देवारी मनानच परही 
देवारी मनानच  परही ।
रीत ल निभानच  परही ।।


    लइका मन रद्दा जोहत होही ।
    मिठाई फटाका लेगेच  ल परही ।।


अंतस ह कतको रोवय  ।
उपरछवाँ हाँसेच ल परही ।।


    पूजा करना हे लछमी के ।
    त घर - दुआर लिपेच ल परही ।।


तेल - फूल, पीसान - बेसन, ओनहा नांवां ।
करजा करके लानेच  ल परही ।।


    मन म तो घपटे अंधियारी हे ।
    फेर डेरौठी म दीया बारेच  ल परही ।।


देवारी मनानच  परही ।
रीत ल निभानच  परही ।।
मौवहारी भाठा  महासमुन्द

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