इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

शुक्रवार, 29 मार्च 2013

दो कविताएं : रावण को मारने के लिए, हालांकि वे भी ....

रावण को मारने के लिए
संकल्प यदु
कठिन नहीं था -
रावण को मारना
राम के लिए
कभी भी ।
रावण को -
मारने के लिए
जरूरी नहीं
दिव्य  पुरूष
या दुनिया से बाहर के
आदमी का होना ।
रावण के पास थे
दस सिर
जबकि एक सिर
बमुश्किल सम्हलता है
एक सिर को सम्हाना
यानि राम हो जाना
रावण को मारने के लिए ।
2
 हालांकि वे भी ....
आग है अभी -
कुछ गिनी - चुनी लकड़ियों के बीच ,
जरूरत है उसे -
हम जैसी और  लकड़ियों की
जो जला देगी इस जंगल को -
अपनी आशाओं के लिए ।
साथियों !
इस अंधेरे में
हम जैसी तमाम दीयों को
जरूरी है -
घर में फैले अँधेरे के साथ ही
एक दूसरे के नीचे
पनपे अँधेरे को हरना
सुबह के लिए ।
अफसोस नहीं मुझे
अपने बुझने का
वजह देख रहा हूँ
अपने सामान दीयों को,
हालांकि वे भी बुझेंगे
मगर -
सूर्य लाने के बाद ।
                                                दाउचौंरा, खैरागढ़ 
जिला राजनांदगांव छग)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें