इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शुक्रवार, 29 मार्च 2013

दो कविताएं : रावण को मारने के लिए, हालांकि वे भी ....

रावण को मारने के लिए
संकल्प यदु
कठिन नहीं था -
रावण को मारना
राम के लिए
कभी भी ।
रावण को -
मारने के लिए
जरूरी नहीं
दिव्य  पुरूष
या दुनिया से बाहर के
आदमी का होना ।
रावण के पास थे
दस सिर
जबकि एक सिर
बमुश्किल सम्हलता है
एक सिर को सम्हाना
यानि राम हो जाना
रावण को मारने के लिए ।
2
 हालांकि वे भी ....
आग है अभी -
कुछ गिनी - चुनी लकड़ियों के बीच ,
जरूरत है उसे -
हम जैसी और  लकड़ियों की
जो जला देगी इस जंगल को -
अपनी आशाओं के लिए ।
साथियों !
इस अंधेरे में
हम जैसी तमाम दीयों को
जरूरी है -
घर में फैले अँधेरे के साथ ही
एक दूसरे के नीचे
पनपे अँधेरे को हरना
सुबह के लिए ।
अफसोस नहीं मुझे
अपने बुझने का
वजह देख रहा हूँ
अपने सामान दीयों को,
हालांकि वे भी बुझेंगे
मगर -
सूर्य लाने के बाद ।
                                                दाउचौंरा, खैरागढ़ 
जिला राजनांदगांव छग)

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