इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

शुक्रवार, 29 मार्च 2013

अंतिम प्रार्थना

कहानी

गिरीश बख्शी
सदानंद को देख मैं हतप्रभ रह गया. शाम जा रही थी. रात आने को थी.चारों तरफ अंधेरा धिरता चला जा रहा था और सदानंद गली के उस हनुमान मंदिर में जहां किसी ने अभी दीया भी नहीं जलाया था भीखभाव से अत्यंत विचलित स्वर में कह रहा था -हे भगवान, महावीर स्वामी. आज मेरी प्रार्थना सुन लेना प्रभु.अभी तक मैं आपसे प्रार्थना ही तो करता आया हूं. पर आज की मेरी प्रार्थना... हे दीनबंधु.. बलशाली ! मुझे निराश न करना आज ।''
इस बूढ़े सदानंद की प्रार्थना....मुझे तभी अचानक याद आ गयी, चौथी कक्ष का बच्‍चा सदानंद की प्रार्थना. अबोध पहले की बात एकबारगी तब जीवंत हो उठी - सदानंद मेरा सदा का साथी !
हमारा आमने सामने घर .मैं दिन - दिन भर उसके यहां रम जाता खेलकूद में.अम्मा बुलाती - आज खाना वाना भी नहीं है क्‍या अनु ? ईतवार का उपवास कर रहे हो ?मैं तुरंत दौड़ आता साथ सदानंद भी दौड़ जाता.मां डांटती - अरे संगधरा तुझे भूख वूख नहीं लगती ? पार्वती परेशान होगी. जा खा पीकर आना .''
हंसमुख सदानंद हंसकर कहता - चाची आप बहुत अच्छा खाना बनाती हो.मैं आज यहीं खा लूं अनु के साथ ?''
अम्मा उसकी होशियारी देख खुश हो जाती - बहुत चतुर चालाक है रे तू ! जा तू भी हाथ धो आ. मैं खाना परोसती हूं.''
हम दोनों सड़क - सड़क नहीं गली - गली स्कूल जाते.गंजपारा प्रायमरी स्कूल.सदानंद को तब गली पसंद थी क्‍योकि गली में रियासतकालीन हनुमानजी का बड़ा मंदिर था.वह बस्ता जमीन पर रख देता.हनुमान जी के पैरों तले लगे बंदन को उंगली से निकालकर माथे और गले में भी लगाता. मैं पूछता - बंदन, गले में क्‍यों लगाता है सदानंद ?''
सदानंद श्रद्धा से कहता - मेरी मां लगाती है इसलिए. वह फिर दोनों हाथ जोड़कर कहता -हे हनुमानजी, इस बर सदानंद का प्रार्थना है - बड़े होने पर आप मुझे पुलिसजी बनाना बजरंगबली.
मैं भी तब बच्‍चा था. उसकी प्रार्थना पर तब मुझे हंसी न आती.मैं कहता - सदानंद तू पुलिसजी क्‍यों बनना चाहता है ?''
वह शान से कहता - मैं .. मैं पुलिसजी बनकर बड़े बड़े लोगों को पकड़ूंगा.मेरा चोर से नहीं बनता. अच्छा  बता तू क्‍या बनेगा ?'' मैं भी घमंड से कहता - मैं जज बनूंगा.अपने चाचाजी जैसा जज. और मैं तुम्हारे पकड़े हुए चोरों को सजा दूंगा.''
पर बचपन की बातें. बचपन की प्राथर्नाएं. सब बचपन में खो गई.न सदानंद पुलिसजी बन सका और न मैं चाचाजी जैसा जज .
हम दोनों मैटि्क के बाद काँलेज में भर्ती हो गए.दोनों के सब्‍जेक्‍ट एक , क्‍लासरूम एक ,प्रोफेसर एक और पास हुए तो डिवीजन भी एक - मतलब सेकंड डिवीजन.पर नौकरी लगी अलग- अलग.सदानंद हुआ बैंक में क्‍लर्क और मुझे मिली स्कूल में टीचरशीप.
शाम को हम दोनों रानीसागर के किनारे - किनारे घूमने जाया करते.खूब बातें करते. वह अपने बैंक की क्‍लर्की से खुश न था. उसे मेरी मास्टरी नौकरी अच्छी लगती. और तनख्वाह कम होने के कारण मेरा आकर्षण बैंक सर्विस में था.दोनों अपनी - अपनी नौकरी की परेशानी बताते.सदानंद कहता - क्‍या‍ बढ़िया तुम्हारा जीवन.सदा बच्‍चों ‍ के बीच  मगन रहते हो।'' मैं दहला मारता - और तुम जो नोटों से खेलते रहते हो.लक्ष्मी जी की तुम पर कितनी कृपा है.हम चाक डस्टर वाले मास्टर को तो हरे - हरे नोट के दर्शन् ही नहीं हो पाते ?''
वह तुरंत जेब से सौ का एक नोट निकालकर कहता - लो, दर्शन कर लो. पर यह सच  है अनु,  शिक्षक जीवन सौम्य  शांत जीवन होता है.''
लेकिन एक दिन सदानंद ने अपने बैंक की नौकरी की खूब तारीफ की. उस दिन वह बड़ा प्रसन्‍न था.बोला - चलो मिठाई विठाई लेकर कहीं दूर किसी बगीचे में बैठे.मैं तुम्हें गोपनीय  बातें बताऊंगा.तुम किसी से न कहना .''
मैं उत्सुक हो उठा. सोचा - प्रमोशन आर्डर आने वाला होगा.पर अनुमान गलत निकला.सदानंद को प्रेम हो गया था.बैंक की सहकर्मी से.मैंने कहा - यार, तुम भी छुपे रूस्तम निकले.क्‍या नाम है कन्या का ... मतलब भाभी का ?''
उसने परेशानी से कहा - अनु,कन्या और भाभी के बीच  में सो मेनी अप्स एंड डाउंस है.पहली बात प्रेम मुझे हुआ है.पता नहीं उस कन्या को भी हुआ है कि नहीं.वैसे वह जब तब मेरे पास आफिशियल प्राब्‍लम लेकर आती रहती है. कहीं वह .. मतलब मेरे प्रेम को ठुकरा ... खैर .. अभी इस बात को छोड़ों.दूसरी बात, यदि कन्या भी मान लो प्रेमाभिभूत हो गई तो मुझे पिताजी का भय  है.वह विजातीय  से विवाह के लिए कतई राजी नहीं होगे. अनु वे जात - पात के मामले कट़टर है.''
मैंने सहानुभूति जताई - सदानंद कहो तो मैं तुम्हारे पिताजी से ...।''
वह एकदम कांप गया - नहीं - नहीं, उनसे कुछ मत कहना.वे भड़क जाएंगे.''
मैं पूछ उठा - तो फिर .... तू क्‍या ... एक दिन देवदास हो जायेगा ?''
वह हंसा नहीं. गंभीर था.बोला - मैं ही कुछ करूंगा.''
फिर हफतों उससे मुलाकांत नहीं हुई थी.वह बैंक के बाद कहां जाता, पता न लग पाता. एक शाम मुझे अकेला घूमते देखकर एक परिचित घुमक्‍कड़ बोला - आजकल तो तुम्हारा सदानंद वो गली में रोज शाम को जाता है क्‍या चक्‍कर है उसका ?''
मैं चकित हुआ - गली में ! कहां कौन - सी गली में ?''
उसने बताया - वही गली, जो गंजपारा स्कूल की ओर जाती है .''
मैं तुरंत लौट पड़ा.मेरी शंका सही थी.सदानंद इसी रियासतकालीन हनुमान मंदिर में हनुमानजी की मूर्ति के सामने हाथ जोड़े खड़ा था.वह कह रहा था - हे संकटमोचन. हे रामभक्‍त. इस प्रेमी सदानंद की प्रार्थना सुन लो, प्रभु मेरा विवाह मेरी सहकर्मी क्‍लर्क कमला से करा दो. कमला से करा दो, हे महावीर बजरंगबली.''
मैंने खंबे की आड़ से देखा - उसके माथे और गले मे बंदन लगा था.
जवानी में जैसे अन्य  लोगों का प्रेम का चक्‍कर कुछ दिनों का होता है, ठीक वैसे ही सदानंद के प्रेम की भी परिणति हुई.कमला के तबादला होते ही उसका एकांगी प्रेम भी अपने - आप तिरोहित हो गया.
एक दिन पिता जी ने जिस कन्या से उसकी शादी तय  की उसी के साथ उसने चुपचाप सात फेरे लगा लिया.पत्नी ही फिर उसकी प्रियतमा हो गई.जीवनचक्र मजे से घूमने लगा.उसके दो लड़के और दो लड़कियां हुई.उसने सबको पढ़ा लिखाकर उसका विवाह किया. लड़कियों की बिदा की.लड़के अपनी - अपनी नौकरी में सपरिवार बाहर है और भगवान की दया से दोनों लड़कियां ससुराल में स्वस्थ एवं सुखी हैं.
और अब रह गये घर में  फिर वही दो के दो.
सदानंद बैंक की नौकरी से रिटायर होकर वृद्ध हो गया और उसकी प्रियतमा बूढ़ी होकर बहरी हो गयी है. तो वही मेरा बचपन का साथी सदानंद हनुमानजी की मूर्ति के सामने हाथ जोड़े विचलित स्वर में कह रहा था -इस बूढ़े सदानंद की प्रार्थना आज सुन लो, प्रभु ! महीनों बिस्तर में पड़े,नाक में नली लगे दरबारी की दुदर्शा देखकर मैं अभी अस्पताल से सीधे आपके पास आ रहा हूं. मैं भयातुर हो गया हूं स्वामी.हे बजरंगबली. हे मेरे ईष्‍टदेव !!मेरी यह अंतिम प्रार्थना है, संकटमोचन, हे कृपासागर. मुझ पर कृपा करना - मुझे स्वस्थ मृत्यु देना, मुझे स्वस्थ मृत्यु देना भगवान ।
  • पता- ब्राम्‍हाण पारा, दिग्‍िविजय कालेज रोड, राजनांदागांव ( छग)

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