इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

हर घड़ी उनके ही कहने



  • एक
हर घड़ी उनके ही कहने वो कहाने से रहे।
हम कहाँ अपनी जगह ठीक ठिकाने से रहे॥
क्या बतायेंगे जमाने ने अगर पूछ लिया।
तेरी तलाश में हम कितने जमाने से रहे॥
लीजिए हम ही किये देते हैं जान, दिल कुरबां।
आप तो सनम हमसे प्यार जताने से रहे॥
एक सहारे की जुरूरत तो हुआ करती है।
बोझ गम का है मगर आप उठाने से रहे॥
तुम मिटा दोगे तो एहसान समझ लूंगा इसे।
मेरे अरमान मेरी जीस्त मिटाने से रहे॥
  •         दो
तकलीफ जिंदगी की उठाई है किसी ने।
दीवार यूं भी घर की बचाई है किसी ने॥
उसकी मदद तो करते नहीं हँस रहे हैं आप।
फरियाद अपने दिल की सुनाई है किसी ने॥
लुटती है आज थाने में औरत की आबरू।
ऐसी रपट भी आज लिखाई है किसी ने॥
अब उसके गिरेबां की तलाशी कुबूल है।
बच्चों के लिए रोटी चुराई है किसी ने॥
आया फटे लिबास पे चादर को डालकर।
अपनी गरीबी यूं भी छुपाई है किसी ने॥
पता - न्यू चंदनियापारा, जांजगीर (छ.ग.)

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