इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

बसंत इस बार

 कविता

  • विजय प्रताप सिंह
सृष्टि को श्रृंगार दो
    प्रकृति को बहार दो
    पतझड़ में वसन - हीन
    पेड़ पौधे याचक से दीन
    छूकर उन्हें दुलार दो
        प्रकृति को बहार दो
    ठिठुरता ठण्ड से सूरज
    वन - उपवन को है अचरज
    निष्प्राण तन में भरो जीवन
    सौन्दर्य शिल्पी करो नवसृजन
    अनुपम कोई उपहार दो
        प्रकृति को बहार दो
    अंगड़ाइयाँ ले , मन प्राण जागे
    तिमिर, आलस्यबोध भागे
    गुलाबी, छरहरी है धूप
    निखर आया है धरती का रूप
    नेह - निर्झर- धार दो
        प्रकृति को बहार दो
    प्रतीक्षित है भ्रमर, तितली
    सरसों की पीली चुनरी खिली
    महकतीं आम्र - मंजरियाँ
    विस्मित हुई दुनिया
    मिलन का पर्व, त्यौहार दो
        प्रकृति को बहार दो
 पता - से.नि.अंकेक्षण, क्लबपारा
महासमुन्द ( छग. )

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