इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

बसंत इस बार

 कविता

  • विजय प्रताप सिंह
सृष्टि को श्रृंगार दो
    प्रकृति को बहार दो
    पतझड़ में वसन - हीन
    पेड़ पौधे याचक से दीन
    छूकर उन्हें दुलार दो
        प्रकृति को बहार दो
    ठिठुरता ठण्ड से सूरज
    वन - उपवन को है अचरज
    निष्प्राण तन में भरो जीवन
    सौन्दर्य शिल्पी करो नवसृजन
    अनुपम कोई उपहार दो
        प्रकृति को बहार दो
    अंगड़ाइयाँ ले , मन प्राण जागे
    तिमिर, आलस्यबोध भागे
    गुलाबी, छरहरी है धूप
    निखर आया है धरती का रूप
    नेह - निर्झर- धार दो
        प्रकृति को बहार दो
    प्रतीक्षित है भ्रमर, तितली
    सरसों की पीली चुनरी खिली
    महकतीं आम्र - मंजरियाँ
    विस्मित हुई दुनिया
    मिलन का पर्व, त्यौहार दो
        प्रकृति को बहार दो
 पता - से.नि.अंकेक्षण, क्लबपारा
महासमुन्द ( छग. )

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