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रविवार, 21 अप्रैल 2013

शेष नहीं उल्लास

कविता
  • श्याम '' अंकुर ''
श्‍याम '' अंकुर ''

सबके मन में -
मंथरा,
राम चले वनवास।

स्वारथ की कैकयी रोजाना
दशरथ पर भारी पड़ती है
सच की सीता
कैद हुई है
फिर भी रावण से लड़ती है
मक्कारी नित -
कर रही,
दुनिया में अभ्यास।

वानर सेना आज अचम्भित
इसको लंका लुभा रही है
कर्तव्यों को
भूल गई औ
खुद को काँटे चुभा रही है
कल है -
इसके साथ क्या,
आज नहीं अहसास।

दंभी रावण
सबके मन में
अपना राज जमाता फिर भी
मूल्यों का
'' अंकुर '' क्षरण हुआ
हिंसा रोज उगाता फिर भी
हनुमानों की -
देह में,
शेष नहीं उल्लास।
पता - हठीला भैरूजी की टेक, मण्डोला वार्ड,बाराँ
राजस्थान - 325205

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