इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

बलि

कंथली

  • आत्माराम कोशा '' अमात्य ''
बड़े भइया ह अपन मयारूक बहिनी ल तीजा ले के जावत राहय। तीन - चार साल के भांचा ल सुघ्घर अकन खंधैया म चढ़ाय नंदिया तीर पहुंचिस त डोंगा म आठ - दस झन मन चढ़गे राहय। भइया धरारपटा चढ़के अपन बहिनी ल हाथ दे के चढ़ाइस। डोंगा जइसे बीच दहरा म गीस त नई जाने कते डहर ले हवा - तूफान, बड़ोरा सरिक आवन लगिस। देखते - देखत उलेंडा पूरा आय सरीख पानी ह सनसना के बाढ़गे। डोंगा ह ऊबुक - चुबुक होय लगिस।
अकरसहा आय बिपत्ति ल देख के एक झन सियनहा जाने असन कहिथे - ये डोंगा म कोनो सगे ममा - भांचा अऊ सीग लइका वाले महतारी ह तो नई बइठे हे ? काबर के अइसने कारन म जलदेवती माता ह अतका परचंड रूप देखाथे। डोंगा म बइठे जम्मों झन म कांव - कांव एके सुर म करे लगिन - कोई हवव त बतावव न गा। अइसन समे म जल देवती माता ह बिगन भख लेय नइ मानय। डोंगहार ह घलोक कहिथे - अइसन स्थिति म एके ठन लइका के बलि देचल परही। नई ते डोंगा खपला जाही अऊ हम सब के जल समाधि हो जाही।''
अतका हो हल्ला सुनके बड़े भइया ह डर्रात - डर्रात बताथे कि जेन लइका ल ओहर धरे हवय वोहर ओखर सगा भांचा आवय अऊ ओखर बहिनी के सीग लइका। अब सब ल समझ आवय लगथे कि ये बिपत्ति के कारन का आवय। लइका के बलि देन बिगन कखरो कलयान नई हे।
अतका बात ल सुनके बहिनी के हाथ - गोड़ फूलजथे। डोंगा म ए झन मरारिन घलोक बइठे रहय। ओखर चरिहा म भांटा, मिरी, कुम्हड़ा, तुमा रहय। विपत्ति के संसों म ओखरो नरी सुखागे रथे, फेर का करे ? दूनों नारी परानी ह आँखी च आँखी म गोठियाथे, सुन्ता बांधथे। ऐला कोनो नई गम पावय। अतका म जोर ले छपाक के आवाज के संग जल देवती माता म कुछू बुड़े के आवाज होथे।
ऐती आवाज आइस अऊ ओती सनन - सनन, सन - सन पानी ह बिच्छी के झार उतरे कस उतरे लगथे। उबूक - चुबुक होवत डोंगा घलोक सम्हल जथे। सब ये समझे लगथे कि जल देवती माता ल लइका के बलि दे दे गीस। डोंगा के पार लगते सांठ सब डोंगा ले उतरे लगिन। ओमन देखिन - ममा हर अपन भांचा ल ओखर महतारी के अँचरा ले निकाल के सुन्दर अकन अपन खंधैहा म चढ़ा लहंग - लहंग रेंगत हवय। ओमन यहू देखिन कि मरारिन बड़े जान कुम्हड़ा दिखत नई हवय ... ?
अध्यक्ष
छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति,
लखोली

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