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शनिवार, 13 अप्रैल 2013

स्‍वर्गीय कृष्‍ण कुमार नायक की कुछ रचनाएं


खुद को तपाया था।
  • कृष्‍ण कुमार नायक
अपने पैदा होने के साथ मैं
लोहा हो गया
मेरी मां ने मुझे कोख में लेने के पहले
बहुत दिनों तक भठ्ठी में
खुद को तपाया था।
        मुझे नहीं मालूम -
        अपनी रिक्तता में मेरी मां
        कहां - कहां नहीं भटकी।
        पर यकायक उसके जिस्म में
        सुर्खी उभरी शायद उन दिनों मैं
        भ्रूण हो गया था - मां के महीन इरादों का।
जब मैंने मां के पेट में आंखें खोली थीं
मैंने भीतर ही भीतर
मां के जिस्म को जांचना शुरू कर दिया था
और गहरे भू - कम्प के साथ बाहर आ गया।
        दूध पीते बच्चे मुझे मूर्ख लगते हैं
        मैं लोहा हूं अपनी पैदाइश के साथ
        मैं कुतरता हूं मिट्ïटी के बड़े - बड़े ढेले
        और पचा जाता हूं अपनी अतड़ियां
        कि बारीक से बारीक संवेदन की बूंद
        मेरे इरादों को मां के इरादों से
        कहीं कमजोर न कर दे मुझे।
तपते ज्वार में उफनकर
जैसे मेरी मां मर गई
मैंने उसके ज्वार की गर्मी को
अपने हौसलों से बांध लिया है
और मैं अब अपने लोहे से खड़ा हूं
श्मशान के घेरे में
किन लोगों ने मेरी मां को दफनाया है
अपनी जमीन से हटाकर - कब्र में!!
गजल
पर्दे की ओट में क्या कुछ नहीं होता।
उनकी नजर में है हर कोई सोता॥
    चंदन की खुशबू छिपाने से क्या होगा।
    गालों की सुर्खियाँ छिपाओ तो जाने॥
    ना - ना कहोगे जमाने के डर से।
    आँखों में बसी तस्वीर छिपाओ तो जाने॥

सवालों की झड़ियाँ लगा सकते हो।
इल्जाम मुझ पर अनेकों लगे हैं॥
जवाब तुम्हारे ख्वाबों में कैद हो गए।
साफगोई के इरादे मचलने लगे हैं॥

    औपचारिकताएं टूट जाएं तो बेहतर।
    पहचान गर रिश्तों में जुड़े तो क्या हो॥
    अमानत में बदनीयती अब ठीक नहीं।
    दो अलग राहें एक ही तरफ मुड़े तो क्या हो॥
    ग़ज़ल
चलो चल कर टहल आएं
शायद कोई सड़क निकल आए

खनकता बर्तन मजूर का
घर में घूस जंगल आए

भीड़ बहुत है नदियों की
मछली में एक बदल आए

रहट - जूते बादलों के संग
काला पानी मुकम्मल आए

तरसे हुए चरण उम्र के
संसद ओढ़कर चप्पल आए

गर्म चर्चा फंसी उंगलियों में
क्रोशिए से बुन गजल आए
कविता 
बाहर - ए - रूवाईयात
नगर के पार तो चलें
गांव के कोठार पर ठहरें
मौसम की उदासी की चिंता
रंगीन लगते आसमां के नखरे॥
    आदमी का दर्द को देखने की जरूरत नहीं
    उसे समझा या महसूसा जावे
     मरहम पट्टी बांध कर दर्द दूर करने वालों
    गरीबों की भावनाओं को अब न चूसा जावे॥
माना हमसे कटकर रह सकते हो
आखिर कब तक आवरण में रहोगे
लेकिन आप अपने से अलग जा रहे हो
सोयी आँखों से भी जागरण में रहोगे॥
    गीतिका
उस दिए तले अंधेरा है
आज अंधेरा जलता है
दिए की यह सफलता है।
    है तो यह रात अमावस की।
    पर धरती पर दिन निकलता है॥
    आजाद होगी लक्ष्मी आज।
    उल्लुओं को यह खलता है॥
मत दिए को दिए से लड़ाओ
अपना ही हाथ जलता है॥
उस दिए तले अंधेरा है
जिसमें गल्त हिसाब चलता है॥
    कोई फूलझड़ी ऐसी छेड़ो
    जिसमें झूमकर प्यार पलता है॥
    मेरी ग$जल है उन्हें समर्पित,
    रौशनी को जिनका मन तरसता है।
ग़ज़ल
जो दवा थी वो बेअसर है
और गरीब सारे बेखबर है
    ये लोग सपने की चर्चा कर रहे
    जरूर इनके पास बिस्तर है
कौतूहल में है भीड़ किनारे पर
इस तालाब में कोई मगर है
    मुआइना किया जा रहा है आजकल
    ये किस सदी का खण्डहर है
लोग जिसको पूजते थे शीश झूकाकर
वो किसी फरिश्ते की कबर है
    ग़ज़ल
एक अलगनी - सा है मन
बस नागफनी - सा है जीवन।
बेरोजगार - से हो गए इरादे
अवैध आगजनी - सा है सपने।
बर्खास्त हो गई सादी हकीकत
पुरानी दुश्मनी - सा है अभिनंदन।
मूर्ख, प्यार एक जेबकतरा है
ऊपरी आमदनी - सा है यौवन।
भूख बेताब गर्भपात के लिए
अखबारी सनसनी - सा है राशन।
कविता
जे.पी.कसम
मम्मी ने डांटते हुए
अन्नू से पूछा -
तुमने कन्नू की पुस्तक के पन्ने
फाड़ दिया है क्या ?
नहीं मम्मी विद्या कसम
धरती माता कसम मैंने
नहीं फाड़ी है।
ये कसम और सौगंध
बड़े ही सहज ढंग से
बात - बात में उठाये जाते हैं
आजकल हर प्रदर्शन और
आन्दोलन में
जयप्रकाश नारायण का आर्शिवाद
बराबर उल्लेखित रहता है।
लगता है जे . पी. कसम
भी सच्चाई की प्राथमिकता हेतु

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