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गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

नारी अबला नहीं

कविता 

  • श्रीमती राधिका सोनी

नारी कब थी अबला बोलो ?
मत कड़वाहट घोलो
जो जग की है सृष्टि जननी
जो है बेटी भगिनी
कभी धर्मपत्नी कहलाती
उसकी करूणा, स्नेह में जी लो
नारी कब थी अबला बोलो ?

विदुषी वह थी वेदकाल में
वीरांगना थी युद्धकाल में
कभी दया की प्रतिमा थी
कभी प्रेम की गरिमा थी
अपने मन में तो तौलो
नारी कब थी अबला बोलो ?

वही मदालसा, राधा, सीता
वही सावित्री, गंगा गीता
लक्ष्मीबाई रानी झांसी
वही है गंगा, मथुरा कांशी
कदम - कदम पर साथ तो हो लो
नारी कब थी अबला बोलो ?

नई सही है नया जमाना
छोड़ो राग पुराना
चरणों की दासी मत कहना
अपने सा बराबर समझना
सामंती युग में मत डोलो
नारी कब थी अबला बोलो ?
पता - क्‍लब पारा, महासमुंद (छग) 

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