इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शनिवार, 20 अप्रैल 2013

परिवर्तन

कविता

  • डॉ . परमलाल गुप्त
पहले रहा लाभ का चिन्तन।
राष्ट्र हेतु बलिदान का चिन्तन॥
हँसते - हँसते प्राण त्याग कर।
राष्‍ट्र  - प्रेम का चेत पाग कर॥
    अर्पित कर अपना सब जीवन।
    माना यही कीमती चिर धन॥
    अब अपना इतिहास बदल कर।
    नव विदेश - चिन्तन पर चल कर॥

भुला दिया अपना सब गौरव।
छाया जिसका था जग में रव॥
अंगरेजी का हाथ थाम कर।
लाये भोगवाद के विषधर॥
    सब देशों को दे आमंत्रण।
    बाजारू ग्लेमर का चिन्तन॥
    उन्हें प्राकृतिक दे संसाधन।
    बने गुलाम लुटा अपना धन॥

उनकी सुविधा आदर देकर।
छोड़ा अपना स्वत्व कलेवर॥
एक वर्ग से भरा अपना घर।
जो सत्ता का रहा पक्षधर॥
    बेच स्वत्व लाये परिवर्तन।
    जिसमें काम भोग मनरंजन॥
    लूट खूब निर्धन का शोषण।
    मरे भूख से जो निस्साधन॥

उन्हें अज्ञ तक दे आश्वासन।
मौज उड़ाते सब अनुचर - गण॥
यह भारत विकास का गायन।
ठनक रहा है रहा - रहा कर मन॥
    उठता नहीं क्रांति का जन - स्वर।
    रखता धर्म नशे में छलकर।
    ऊपर से धन लाभ प्रलोभन।
    अटका भोग - तृषा में जन - मन॥
पता - संयोजक,
अ.भा.ग. साहित्यकार परिषद,
बस स्टैण्ड के पीछे, पटना

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