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रविवार, 21 अप्रैल 2013

मछंदर

कविता
कुबेर सिह साहू

  • कुबेर सिंह साहू
मछंदर एक
जाल रहा फेंक
समन्दर में।
जाल अति विशाल
करता दिगन्त आक्रान्त
लपलपाता, गिरता छपाक
लक्ष्य को रहा ताक
हिंस्त, शिकारी जानवर की तरह
क्लांत, श्रांत
सारे सागरों, महासागरों
समस्त नदियों, झीलों और तालों को
सारे जलचरों और थलचरों को
लीलने अपने विशाल मुख विवर में।
जाल की बुनावट और बनावट अति आधुनिक
अतिविकसित वैज्ञानिक तकनीक
सोने चांदी के तारों से बना
पश्चिम से पूरब की ओर तना
ऐश्वर्य - अलीक
से लुभाता, उतरता
वर्षों से रिक्त उदर में।
कतरा आखेट
विश्व - मानस - वन में
प्रहार सत के मन में
तीर होता पार नैतिकता के सीने से
सारे मूल्यों का रक्त करता पान
भक्षण भावों का
लुप्फ लेता मानवीय आहों, कराहों का
करता अट्टहास
बढ़ता आता सवार
विकाराल दम्भ लहर में।
पता - ग्राम - भोढ़िया पो. सिंघोला
जिला - राजनांदगांव ( छग.)

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