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इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

रविवार, 21 अप्रैल 2013

मछंदर

कविता
कुबेर सिह साहू

  • कुबेर सिंह साहू
मछंदर एक
जाल रहा फेंक
समन्दर में।
जाल अति विशाल
करता दिगन्त आक्रान्त
लपलपाता, गिरता छपाक
लक्ष्य को रहा ताक
हिंस्त, शिकारी जानवर की तरह
क्लांत, श्रांत
सारे सागरों, महासागरों
समस्त नदियों, झीलों और तालों को
सारे जलचरों और थलचरों को
लीलने अपने विशाल मुख विवर में।
जाल की बुनावट और बनावट अति आधुनिक
अतिविकसित वैज्ञानिक तकनीक
सोने चांदी के तारों से बना
पश्चिम से पूरब की ओर तना
ऐश्वर्य - अलीक
से लुभाता, उतरता
वर्षों से रिक्त उदर में।
कतरा आखेट
विश्व - मानस - वन में
प्रहार सत के मन में
तीर होता पार नैतिकता के सीने से
सारे मूल्यों का रक्त करता पान
भक्षण भावों का
लुप्फ लेता मानवीय आहों, कराहों का
करता अट्टहास
बढ़ता आता सवार
विकाराल दम्भ लहर में।
पता - ग्राम - भोढ़िया पो. सिंघोला
जिला - राजनांदगांव ( छग.)

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