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शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

कविता


रमेश कुमार सोनी
बाजार
वह समाधि में है
सावधान
उस बूढ़े शेर की तरह
किसी शिकार की तलाश में
अपनी मासिक आमदनी को
मात्र दो दिन में व्यय कर
पूरे माह भर तक
वह ऐसा ही रहता है।
जड़ता की झूठी समाधि में
अपने दिल दिमाग को
गिरवी रख कर
पूरे माह तक
जिंदा रहता है वह,
हां, उसने हार नहीं मानी है
अब तक जिंदगी से
परन्तु मुस्कुराने के लिए वह
मुखौटे जरूर बदलता है
बदलते वक्त और मौसम के साथ
वैश्विक व्यापार की
पताका उठाए
अपनी सुरसा मुंह लिए
बाजार आ धमकता है
तुरंत वहीं और
निगल जाता है
उसके पूरे घर - परिवार को
जो सिकुड़ते हुए
सूक्ष्म हो गया था
अतिसूक्ष्म॥
2 व्यापार
खरीद सकते हैं आप
कहीं भी - कुछ भी
कीमत लगी पर्चियों वाली
सामग्रियों को
श्मशान के बाजार में भी,
सपने, भावनाएं, संवेदनाएं
चाँद - सूरज, हवा - पानी, प्रकृति
अपनी हस्ती के मुताबिक।
छीन भी सकते हैं इन्हें आप
चाकू टिका, बंदूक दिखाकर
अपहरण की फिरौती मांग
मजबूरी का फायदा उठाकर
अब लाठी और भैंस की
जगह ले ली है
बंदूक और इच्छित वस्तु ने॥
वक्त उनकी ड्यूड़ी पर
चौकीदारी तथा
मौसम गुलामी करता है
मौत को भी छकाते हुए
हममें भी तीन पग से
ब्रम्हांड नापने की कला है,
किन्तु खरीदने - बेचने के चक्कर में
भूल जाते हैं कि लोग
क्रेता है या विक्रेता ?
हैं तो किसके ? कब ?
हर अच्छी - बुरी चीज के व्यापारी॥
  • पता - जे.पी. रोड, बसना ( छग. )

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