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मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

दर्पण में दोष नहीं ...

 कविता

  • विद्याभूषण मिश्र
सबसे कठिन आदमी को है, आज समझ पाना।
लोग चाहते हैं बातों को, ज्यादा उलझाना॥
    बड़ी बड़ी बातों की दुनिया
        भीतर रोश नहीं।
    युग है आज मुखौटों का
        दर्पण में दोष नहीं।
भीतर ईर्ष्या - द्वेष पालते, बाहर मुस्काना।
सबसे कठिन आदमी को है, आज समझ पाना॥
    आज खुशामदखोर अहं के
        गरल उगलते हैं।
    करते हैं बाहर से सौदा
        भीतर बिकते हैं।
बुझे दीपकों को मुश्किल है, पुन: जला पाना।
सबसे कठिन आदमी को है, आज समझ पाना॥
    रिश्ते - नाते हुए खोखले
        मुंह देखा व्यवहार।
    उल्लू सीधा करने वालों
        की है आज कतार।
जब सइयाँ कोतवाल तो काहे, को है भय खाना।
सबसे कठिन आदमी को है, आज समझ पाना॥
    पल - पल डींग हाँकते रहते
        यश दुहराते हैं।
    चमचे स्वारथ का रस पीने
        शीश झुकाते हैं।
किन्तु असंभव है खोटे सिक्कों, का चल पाना।
सबसे कठिन आदमी को है, आज समझ पाना॥
 पता - पुरानी बस्ती, ब्राहा्रणपारा
मु.पो. - जांजगीर ( छग.)  

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