इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

रविवार, 21 अप्रैल 2013

बरगद का पेड़



  • बाके बिहारी शुक्ल
जब मैं 9 साल का था तभी मेरी मां सन्यपात रोग से तड़प- तड़प कर दिवंगत हो गई। मेरे पिता उन दिनों लीला मंडली में गये हुए थे। मां की मृत्यु से टूट से गये। घर में चार छोटे बच्चे। छोटी सी खेती। साधनहीन परिवार वे बहुत चिड़चिड़े और क्रोधी हो गये थे। बात - बात में अपनी खीझ निकालने के लिए मुझे कम, मेरी बहनों को कम मारते थे। थाली पटक देते थे। उन दिनों हमारे घर मिट्टी की हंडी में भोजन बनता था। उसे अक्सर पटक देते थे। उसके बाद क्या गति होती रही होगी, सहज अनुमान लगा सकते हैं। एक तरह से नारकीय जीवन जी रहे थे। रात में उनके मन में करूणा जगती थी फलस्वरूप हमें एक गाना गाना पड़ता था -
'' जिसके घर में मां नहीं, बाबा करे न प्यार। ऐसे दीन अनाथों के प्रभु, तुम ही हो आधार॥''
ऐसे समय मैं दोपहर चुपचाप गांव के बाहर एक बरगद के पेड़ में चढ़कर उसकी चौड़ी काया में घंटो बैठकर मातृत्व का सुख पाता था। कुछ दिन तो चुपचाप भागवत का एक मंत्र नमो भगवते वासुदेवाय जपा करता था। मेरे बाल मन में आशा थी कि भगवान मेरी मां को वापस भेज देगे। मां तो वापस आ न सकी किन्तु बरगद की मोटी डंगाल को आलिंगन में भर मुझे मन के तन का बोध होने लगा।
धीरे - धीरे किशोरावस्था आई। उच्च शिक्षा हेतु ऊंची कक्षाओं में पर्दापण हुआ। जब भी मौका लगता किताब लेकर उसी पेड़ में चढ़कर अध्ययन किया करता था। एक दिन एक सांप दोनों हाथों से होता हुआ निकल गया। उसके निकल जाने के बाद मुझे बोध हुआ। वहीं से जमीन में नीचे कूद गया। हल्की चोंट आई किन्तु पता चला कोई जीव आदमी को जानबूझकर नहीं काटता इसलिए सबके प्रति हमारे मन में मैत्री भाव होना चाहिए।
किशोरावस्था के कारण दाढ़ी मूंछे आने लगी थी। मन मधुराने लगा था। जैसे जैसे मेरी उम्र बढ़ी, बोध और जानकारी बढ़ी। बरगद के पर्यावरणीय महत्व को भी जाना। छुट्टी में मैं सारी दोपहरी यहीं आकर किताबे पढ़ता था। चिंतन करता था। बाल्यकाल में मेरा यहां आना भले ही पलायन रहा हो अब तो बोध स्थल हो गया था।
गर्मियों में बरगद के पत्ते झड़ते हैं। नये पत्ते आते हैं। यह कार्य साथ- साथ चलता। एक ओर पुराने पत्ते हवा के झोंकों से गिरते रहते हैं, दूसरी ओर नये - नये आकर्षक पत्ते आते रहते हैं। डंगालों की नोक पर नये पत्तों को प्रकृति कितने जतन से प्रकट करती है, उसके आवरण कैसे खुलते थे, दर्शनीय होता था। बरगद के नीचे पुराने पत्तों और आवरण पत्र [रेपर]से भर जाता था। गांव की कुम्हारिने इसे बुहारकर मिट्टी के बर्तन पकाने के लिए ले जाती थी।
इसके बाद नन्हें - नन्हें फल लगते थे। दोपहर हरे पत्ते से छनकर आती हुई धूप का नजारा जिन्होंने नहीं देखा है, वे इसे एक बार अवश्य देख ले अन्यथा - वृथा गत: नरस्य जीवनम्। छोटे फल क्रमश: बढ़ते थे। उनकी वृद्धि की सुकुमारता के वर्णन के लिए ही मानो जयशंकर प्रसाद ने कामायनी के लज्जा सर्ग में लिखा है -
कोमल किसलय के अंचल में नन्हीं कलिका ज्यों छिपती सी।
गोधूली के धूमिल पट में दीपक के स्वर में दीपती सी॥
मंजुल स्वप्नों की विस्मृति में मन का उन्माद निखरता ज्यों।
सुरभित लहरों की छाया में बुल्ले का विभव विखरता ज्यों॥
भीषण गर्मी के दिनों में जब अधिकांश पेड़ पौधे पुष्प पत्र विहीन हो जाते हैं उन्हीं दिनों बरगद के फल लाल होकर पक जाते हैं। शत सहस्त्र रंग बिरंगे पक्षी कलरव करते पेट भरने हेतु दिन भर डेरा डाले रहते हैं। विशेषकर सलई मैना, हरिल, दूधराज,कोआटेना तोता, पड़की, आदि। पके फल नीचे गिर जाते थे। अपने दूधिया गुण के कारण मिट्टी पैरों में चिपकते थे। बरगद के नीचे फल के सड़ने के कारण मिट्टी बहुत उपजाऊ हो जाती है इसे खेत में डालना गुणकारी होता है।
कहा जाता है कि वृक्षों में बरगद और पीपल सब से बुद्धिमान वृक्ष होते हैं। इसके नीचे साधना जल्दी सिद्ध होती है। कालांतर में इसकी अनुभूति मुझे धीरे - धीरे होने लगी थी। जब मैं प्राध्यापक हो गया तो बड़े जटिल शास्त्रों का अध्ययन इसी के ऊपर बैठकर किया करता था। बाद में इसके ऊपर मचान बनवा लिया जिसमें एक साथ कई लोग बैठकर चर्चा कर सकते थे। मेरे एक साथी प्रभाकर दर्शन जो प्राय: यहां बैठकर मुझसे शास्त्र चर्चा किया करते थे, कई शोध ग्रन्थों को इसके चारो ओर घूम - घूम कर मैने लिखवाया है। प्रदक्षिणा क्या होती है इसका महत्व भी मैं बरगद के चारो ओर घूम - घूम कर जाना। आज भी किसी समस्या का समाधान पाने के लिए मैं बरगद के चारो ओर प्रदक्षिणा का प्रयोग करता हूं।
अब तो इसमें जटायें निकलने लगी है। बरसात में जब धरती नरम हो जाती है उन्हीं दिनों इनमें धरती की ओर तेजी से वृद्धि होती है ताकि धरती इन्हें आत्मसात कर सके। हम यदि वैरभाव, अहंकार त्याग दे तो हमारा सम्पूर्ण परिवेश हमारी सहायता करने लगता है। कविवर टैगोर की एक बंगला रचना का भाव है कि  अब मैं स्वर्ग जाना नहीं चाहूंगा। क्योंकि जब तक पुण्य संचित रहता है तभी तक स्वर्ग में आदर होता है। बाद में तिरस्कार पूर्वक ढकेल दिया जाता है। कोई साक्षु नयन विदाई देने नहीं आता ऐसे समय में हमारी धरती हमें करूणा पूर्वक स्वीकार कर लेती है। बरगद के इस कारूण्य भाव से मैं कई बार अवगत हुआ हूं।
वर्षा के दिनों में भी इसके नीचे मैं कई बार आश्रय ग्रहण किया हूं। वर्षा की बूंदे जब टप - टप इस पर पड़ती है तो ओंकार नाँद की अनुभूति होती है। इसके नीचे के धरती से जो गंध निकलता है उसकी कोई उपमा नहीं है महाकवि कालिदास ने ठीक ही लिखा है। मां के स्तन्यपान की खूशबू प्रथम वर्षा से भींगी धरती की खूशबू की कोई तुलना नहीं।
बरगद गुलाब जैसा सुगन्धित फूल नहीं देता और न कटहल जैसा फल न ही आम जैसे मंजरिया फिर इसका सौन्दर्य नित नवीन है। हर मौसम में नये नये रंग में प्रकट होता है। एक विराट सौन्दर्य इसके गर्भ में निहित रहता है। मैंने अपने जीवन में इसके रहस्यमय आध्यात्मिक सौन्दर्य का प्राय: साक्षात्कार किया है।
इसकी लकड़ी का कोई फर्नीचर नहीं बनता और न ही पुष्प पत्र फल मनुष्य के सीधे उपयोग में आते हैं। भौतिक दृष्टि से बरगद कोई उपयोगी पेड़ नहीं है। किन्तु जितना आक्सीजन देता है, जितनी घनी छाया देता है। पर्यावरण को जितना संतुलित रखता है, उसका आकलन सामान्य गणित से संभव नहीं है। उसके लिए उच्च गणित का हिसाब अपेक्षित है। मनुष्य केवल आवश्यकताओं [ भौतिक ] के धरातल पर नहीं जीता उसकी मानसिक व आध्यात्मिक भूख भी है। इसीलिए हमारे पूर्वज जहां गेंहू धान आदि अन्न की खेती करते हैं, जहां फल - फूल के लिए उपवन लगाते हैं वहीं चौराहे में तालाब के मेढ़ में मैदानों में बरगद पीपल लगाते हैं। बरगद को देखकर साक्षीभाव को बोध होता है शताब्दियों तक यह मूक दर्शक की भांति खड़ा रहता है विषम से विषम परिस्थिति में भी जी लेता है। धूप ठंड और वर्षा को समान भाव से मुस्कराते हुए झेलता रहता है। गीता कहती है -
दुखेषु अनुद्विग्र मन: सुखेषु विगतस्पृह:
वीत राग भय क्रोध स्थित ही मुनिरूच्यते।
आयुर्वेद में बरगद का जड़ छाल दूध और फलों का औषधीय उपयोग है। पारखी लोग यथावसर इसका उपयोग कर लाभ उठाते हैं इसलिए लोग इसकी लकड़ी को जलाते नहीं अपितु पूज्य मानते हैं। हमारे देश के इतिहास में बरगद को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इलाहाबाद का अक्षयवट तो प्रसिद्ध है ही, गया का बोधिवृक्ष भी विश्वभर में ख्याति प्राप्त है। पहले गांव में बाराती ठहरने का यही प्रमुख स्थान होता था। इसकी डंगाले आकाश में दूर - दूर फैली रहती है। अस्तु मधुमक्खी के बड़े - बड़े छत्ते इसमें झलते देखे जा सकते है। रतनपुर के राजघराने के इतिहास बरगद के इन छत्तो के कारण एक नया रहस्य [दीवान से नियोग]प्रकट हुआ।
महाकवि तुलसीदास ने लिखा है -
को जाने को जैहे जमपुर को सुरपुर परधाम को।
तुलसी हमें भलो लागै जग जीवन राम गुलाम को॥
इसी प्रकार बरगद का व्यक्तिगत अथवा सामाजिक महत्व क्या कितना है यह तो विशेषज्ञ लोग जाने किन्तु मेरे जीवन में इसने इतना सम्बल प्रदान किया है कि मेरा टूटता और बिखरता हुआ जीवन सम्हल गया। मैं आज भी इसके ऊपर मचान पर बैठकर बरसात में अरपा नदी की जलधारा को देखता हूं तो लगता है - अये लब्धं नेत्र निर्वाण। इसी प्रकार इसकी छाया में बैठे शिलापट्टï में बैठकर देश - विदेश के लोगों के चर्चा कर ब्यासगद्दी का बोध प्राप्त करता हूं।
बरगद के ऊपर निहारते हुए अनंत आकाश में मंडराते बाज पक्षी को देखकर अशरीरी का सहज ही बोध होता है-
शुधु विद्यातार सृष्टि नहि तुमि नारी।
पुरूष गढ़ेछे तुमि आपनि अनुहारी॥
बरगद केवल प्रकृति की रचना नहीं है इसे हमारे मन मस्तिष्क ने कला और आध्यात्म ने भी गढ़ा है।
  • पता - बी - 5 नेहरू नगर, बिलासपुर ( छग. )

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