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गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

दो कविताएं


  • संतोष श्रीवास्तव ' सम'
भोर का तारा
नभ में
अनेक तारे
रात्रि में
रौशनी बिखेरते हैं
टिमटिमाते तारों में,
उस एक तारे का
टिमटिमाना
अलग होता है
उस तारे की चमक
अनेकों पर भारी पड़ती है
उसका देदीप्यमान प्रकाश,
कोई लघु चांद
बन जाने उत्सुक है
वह मोह से दूर
माया से दूर
संकीर्णताओं से परे
सबसे पृथक
अपने अस्तीत्व की
तलाश में फिरता
सारा नभ
उसे छोटा दिखता है
वह किसी रात्रि में
नहीं रहना चाहता
वह प्रात: की ओर
गमन कर जाता है
वह भोर का तारा
बन गया है।
कुंए का अस्तीत्व
वह कुंआ थोड़े जल को
लिए सोचता है -
मुझमें दुनिया डूब सकती है
मेढकों का डूबकियां लगाना,
संसार के प्राणियों का
तरना समझता है।
कुंआ वृहत बन चुका है,
अपने आप में।
वह सोचता है -
दुनियां इतनी है
कुछ कीटों को वो,
दुनिया के सारे प्राणी
समझने लगा है।
किसी समय
कुंए के घेरों के
टूटने पर
जब उसका जल
समुंदर में
गमन कर जाता है,
तो जल वहां
कुंए का नहीं
समुंदर का हो जाता है
और उसे याद आता है
अपने कुंए का अस्तीत्व।
पता - शिक्षक,सरस्वती शिशु मंदिर उ.मा.विद्यालय,
भानुप्रतापपुर, जिला - कांकेर ( छ.ग.)

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