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मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

सुनव सरकार

कविता

  • रामसाय धारिया
सुनव - सुनव सरकार सुनव बिनती हमार।
सबके दुख ला टारथो, तइसे हमरो दुख ल टार॥
जघा- जघा म काम खोले,
कर देहे ठेकादारी।
रगड़ तान तो काम कराथे,
पइसा लेथे मारी।
सुनव - सुनव सरकार सुनव बिनती हमार।
सबके दुख ला टारथो, तइसे हमरो दुख ल टार॥

कानून - कायदा ओला सुनाबे,
करथे झगरा गारी।
पुलिस दरोगा करा जाबे,
नई सुनय गोहारी।
सुनव - सुनव सरकार सुनव बिनती हमार।
सबके दुख ला टारथो, तइसे हमरो दुख ल टार॥

कालाबाजारी-चोरबाजारी,
भारी जमाखोरी।
जनता बिचारी का करही,
होथे अब्बड़ अतियाचारी।
सुनव - सुनव सरकार सुनव बिनती हमार।
सबके दुख ला टारथो, तइसे हमरो दुख ल टार॥

किसिम - किसिम के नेता बनगिन,
युनियन बनगिन सारी।
मजदूर बेचारे का करही,
आशा बांध दीन भारी।
सुनव - सुनव सरकार सुनव बिनती हमार।
सबके दुख ला टारथो, तइसे हमरो दुख ल टार॥
ग्रा.पोष्‍ट  - झरना,व्हाया - बाराद्वार
जिला - जांजगीर - चांपा (छ.ग.)

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