इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

रविवार, 5 मई 2013

धरती के पुजारी



  • गोपाल दास साहू
मोर धरती के एके झन दिखथे गा पूजा करइया।
बाकी मोला लागथे कुर्सी के तोड़इया॥
नांगर बइला लथपथ होथे,बइला भइसा सदबद होथे।
       गोबर खातू राख गिल्ला, हम कमाथन माई पिल्ला॥
       भरे बरसात म बासी खाके, आगी के तपइया।
मोर धरती के एके झन दिखथे गा पूजा करइया।
बाकी मोला लागथे कुर्सी के तोड़इया॥
माड़ी भर पानी म ठाढ़े रहिथे, मोरा खुरमी ओढ़े रहिथे।
    नई डर्राये सॉप डेरु ला धान के निंदईया॥
    चिखला फुगड़ी खेले जांगर के तोड़इया।
मोर धरती के एके झन दिखथे गा पूजा करइया।
बाकी मोला लागथे कुर्सी के तोड़इया॥
झुमर - झुमर के धान लुथे,सीत म पसीना चुहत रहिथे।
    निहर - निहर के भारा बंधइया॥
    पंड़की, सुवा, ददरिया खेत म गवइया।
मोर धरती के एके झन दिखथे गा पूजा करइया।
बाकी मोला लागथे कुर्सी के तोड़इया॥
ठक ठक, ठक ठक दांत बाजे, जाड़ म चोला कांपे।
    खोर्रा खटियाँ, गोरसी आंच के सोवइया॥
    कहां मच्छरदानी पाही, कमरा के ओढ़इया।
मोर धरती के एके झन दिखथे गा पूजा करइया।
बाकी मोला लागथे कुर्सी के तोड़इया॥
धकधक ले घाम ऊगे, तीपत भोंभरा देहे ला थुरे।
    भरे मंझनिया खेत - खार के कमइया॥
    तामेश्वर संगी मोर, ' गोपाल ' संग रइवइया।
मोर धरती के एके झन दिखथे गा पूजा करइया।
बाकी मोला लागथे कुर्सी के तोड़इया॥

पता - भंडारपुर (करेला)
पो.- ढारा, व्हाया - डोंगरगढ़, जिला - राजनांदगांव(छग.)

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