इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

रविवार, 5 मई 2013

दो मुक्तक


  • डा. जयजयराम आनंद
  1. काले काले बादल
काले - काले बादल
काले - काले बादल आते
सागर से पानी भर लाते
रिमझिम - रिमझिम बन जब बरसें
सुख सपने सबको दे जाते

काले - काले पहाड़ ऐसे
धुनी रूई के ढेर हों जैसे
मौसम के संग रूप बदलते
देखते हैं फिर ऐसे - वैसे

मोर पपीहा तितली नाचें
दादर - झींगर पोथी बांचें
कुँआ - बाबड़ी ताल - तलैया
खेत फसल की खिलती बांछें

पवन जहाँ ले जाए चल दें
गरज - गरज कर गुस्सा उगले
बीच - बीच में चमके बिजली
पत्थर, कहीं फूल बन बरसे
वसंत
वन वसंत की महिमा न्यारी
फूल जड़ी दुल्हन की सारी
हँसता है बन - बीहड़ जंगल
बाग बगीचा क्यारी - क्यारी
वन वसंत की महिमा न्यारी

नागफनी जब बन ठन निकली
तब बबूल की दुनिया मचली
फूलों ने हँस अगवानी की
कहा शूल रक्षक है असली

जब वसंत पलाश घर पहुँचा
लाल - लाल घर रंगा समूचा
सरसों , अमलतास, गुलमोहर
बेच रहे रंगीन गलीचा

दिशा - दिशा में जमा रंग है
सारी दुनिया देख दंग है
फूले नहीं समाता मधुवन
ऋतुओं का ऋतुराज संग है
पता - आनंद प्रकाशन, प्रेम निकेतन, ई 7/70, 
अशोका सोसाइटी, अरेरा कालोनी, भोपाल (म.प्र)

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