इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

रविवार, 5 मई 2013

बच्चे

कविता

  • डां. महेन्द्र अग्रवाल
गली - गली में
भीख मांगते
रोते हैं बच्चे
०००
किस्मत ने घर - बार
छुड़ाकर
जंगल में पटका
रहा त्रिशंकु
भावी जीवन
इधर उधर लटका
बोझ गरीबी का
कन्धों पर
ढोते हैं बच्चे
०००
मन शरीर से
जेबों से भी
हैं रीते रीते
मिले शहर में
कई हजारों
जूठन पर जीते
दिन भर जूठे
कप प्लेट को
धोते हैं बच्चे
०००
बूढ़े है माँ बाप
बहन के
पांव जवानी में
उम्र कटी है
आंसू पीकर
दुखद कहानी में
अपना बचपन
और जवानी
खोते हैं बच्चे
०००
हाड़ तोड़ कर
बीस कमाये
ले आऐ आटा
पीकर दारू
बाप जमाये
माथे पर बाटा
०००
फटी दरी पर
डरे - डरे से
सोते हैं बच्चे।
सम्पादक नई ग़ज़ल
सदर बाजार, शिवपुरी (मप्र.)

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