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रविवार, 5 मई 2013

भेद - भाव झन लावा


  • विद्याभूषण मिश्र
जात - पाँत के गइस जमाना, गुन के मान बढ़े हे।
कँटही बमरी के ऊपर मा, बोदी नार चढ़े हे॥
    छुआछूत के बात ल टारा
        मन के दिया जलावा।
    दया - मया के नवा अँजोरी
        ले अँधियार भगावा॥
अँधरा के आँखी खुल जाही, जेमा प्रेम भरे हे।

    जेकर खाथन - पीथन ओहर
        सबके धरती मइया।
    सबे जात के जल गंगाजल
        शिवजी मान रखइया॥
जगन्नाथ जी के द्वार हर, सब बर खुले खड़े हे।

    घाठ - घठौंधा अलग - अलग हें
        अब ये सोच मिटावा।
    हमर उँकर पारा कहि - कहि के
        भेद - भाव झन लावा॥
धान के बिरवा अलग - अलग हे, एक्के रंग भरे हे।

    रंग - रंग के फूल भले हें
        माला एक कहाथे।
    भारत माता ओला पहिरै
        जय - जय सुर लहराथे॥
सत्य - अहिंसा काते बर, मन चरखा चरर चले हे।

पता- पुरानी बस्ती, ब्राम्‍हणपारा, मस्जिद मार्ग, मु.पो. - जांजगीर(छग.)

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