इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

गुरुवार, 9 मई 2013

ग़ज़ल


  • महेन्द्र राठौर
तस्वीर देख लेते, हमसे जो प्यार होता।
जख्‍मों को सेंक लेते, हमसे जो प्यार होता॥

महफिल में सबको देखा हम पर न डाली नज़रें।
चोरी से देख लेते, हमसे जो प्यार होता॥

दरिया में डाल कर ये क्यूँ आग लगा दी।
चिट्ठी को देख लेते, हमसे जो प्यार होता॥

फूलों में फेंकना तो तौहीन है हमारी।
कांटों में फेंक लेते, हमसे जो प्यार होता॥

मेले की भीड़ में भी डरते हो ज़माने से।
रस्ते में रोक लेते, हमसे जो प्यार होता॥

भेजा था फूल हमने खुश्बू ये दिल बसाकर।
बोसे अनेक लेते, हमसे जो प्यार होता॥
  • पता - न्यू चंदनिया पारा, जांजगीर (छग.)

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