इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

गुरुवार, 9 मई 2013

ग़ज़ल


  • महेन्द्र राठौर
तस्वीर देख लेते, हमसे जो प्यार होता।
जख्‍मों को सेंक लेते, हमसे जो प्यार होता॥

महफिल में सबको देखा हम पर न डाली नज़रें।
चोरी से देख लेते, हमसे जो प्यार होता॥

दरिया में डाल कर ये क्यूँ आग लगा दी।
चिट्ठी को देख लेते, हमसे जो प्यार होता॥

फूलों में फेंकना तो तौहीन है हमारी।
कांटों में फेंक लेते, हमसे जो प्यार होता॥

मेले की भीड़ में भी डरते हो ज़माने से।
रस्ते में रोक लेते, हमसे जो प्यार होता॥

भेजा था फूल हमने खुश्बू ये दिल बसाकर।
बोसे अनेक लेते, हमसे जो प्यार होता॥
  • पता - न्यू चंदनिया पारा, जांजगीर (छग.)

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