इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

गुरुवार, 9 मई 2013

ग़ज़ल


  • महेन्द्र राठौर
तस्वीर देख लेते, हमसे जो प्यार होता।
जख्‍मों को सेंक लेते, हमसे जो प्यार होता॥

महफिल में सबको देखा हम पर न डाली नज़रें।
चोरी से देख लेते, हमसे जो प्यार होता॥

दरिया में डाल कर ये क्यूँ आग लगा दी।
चिट्ठी को देख लेते, हमसे जो प्यार होता॥

फूलों में फेंकना तो तौहीन है हमारी।
कांटों में फेंक लेते, हमसे जो प्यार होता॥

मेले की भीड़ में भी डरते हो ज़माने से।
रस्ते में रोक लेते, हमसे जो प्यार होता॥

भेजा था फूल हमने खुश्बू ये दिल बसाकर।
बोसे अनेक लेते, हमसे जो प्यार होता॥
  • पता - न्यू चंदनिया पारा, जांजगीर (छग.)

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