इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

रविवार, 5 मई 2013

अब सिलसिला

  • अशोक ' अंजुम ' 



चल रहा है अजब सिलसिला
कीजिए देश को पिलपिला
०००
मत दुहाई करॅप्शन की दो
तुमको शायद नहीं कुछ मिला
०००
बन गये मुख्यमंत्री वे अब -
गाँव उनका बनेगा जिला
०००
सबका ईमान है हाट में
दाम जो भी मिलें, बस मिला
०००
याद हैं अब युवाओं को बस
माधुरी, चावला, उर्मिला
०००
यार कुर्सी पे आने तो दे
सब मिटा दूंगा शिकवा -गिला

डाकू हो गए

कुछ तमंचे, शेष चाकू हो गए
यार मेरे सब हलाकू हो गए

वे इलेक्शन में जो हारे इस दफा
खीजकर चम्बल के डाकू हो गए

नग्न - चित्रों को पलटते थे मियाँ
हम समझते थे पढ़ाकू हो गए

बाद शादी के वो कुछ ही साल में
उम्र - वालों के भी काकू हो गए

देख लो बापू वे बन्दर आपके
आजकल बेहद लड़ाकू हो गए

पता - सम्पादक -प्रयास 615,ट्रक गेट,
कासिमपुर 6 पा.हा. 8 अलीगढ़ (उ.प्र.)

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