इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

गुरुवार, 9 मई 2013

जीवन एक परीक्षा

 कहानी

  • रमेश कुमार सोनी
इंकलाब जिंदाबाद, भारत माता की जय, स्वतंत्रता दिवस अमर हो के नारे एवं टूटी घंटी की आवाज ने तो आज आधी रात ही सबकी नींद उड़ा दी। उसका चीखना - चिल्लाना कभी भी, कहीं भी प्रारंभ हो जाता है। मानो यही उसकी जिंदगी बन गई हो, पहले वह स्कूल में चिल्लाया करता था। विद्यालय ही उसकी जिंदगी और जीवन के सब कुछ थे। शासन के निजीकरण और उदारीकरण की चक्र में गांव का एकमात्र सरकारी स्कूल भी भेंट चढ़ गया था। तब से वहां शाला नहीं लगती, मगर राममिलन अब भी वहां पढ़ाते थे - मूक पक्षियों को। उनके साथ हँसते, खिलखिलाते, नारे लगाते और उनका दुख दर्द बाँटते रहता। वर्षों से वह उस विद्यालय का एकमात्र व्यक्ति था। घंटी बजाने से पढ़ाने तक पूरा काम वही करता था। माता की तरह वह अपने सपनों के विद्यालय को गर्भ में रखकर आने परिश्रम से सुंदर रूप देता, संवारता और जब वाह - वाही की बारी आती तो उसे उसके पितृत्व, ममत्व के हक से वंचित कर दिया जाता। उसका जीवन हर कदम पर एक परीक्षा से गुजरता था। कितनी संजीदगी से वह अपना श्रेय दूसरों को लेता हुआ देखता था। उसमें सहनशीलता पृथ्वी सी सहनशीलता थी।
गांव के समीप खड़ी संगमरमरी चमचमाती विशाल अट्टालिका को देखकर लगता है कि कुबेर ने यहाँ सारे कोष खाली कर दिए हो। विश्वकर्मा को भी दाँतों तले उंगली दबानी पड़ेगी, स्वर्ग का राजप्रसाद जिसे लोग अंग्रेजी स्कूल कहते थे। यहाँ प्रवेश से निर्गम तक हर बात का पैसा लगता था। ये रईसों की दुनिया थी, यहाँ बिना पैसे वाले अस्पृश्य ...। पहले इन्होंने हमें व्यापारी बनकर लूटा अब शिक्षा द्वारा समाज सेवा का कथित ढोंग करने वालों की श्रद्धा और भक्ति अब भी विदेशी भक्ति एवं संस्कृति को समर्पित है। देश की संपदा पढ़ कर विदेश सेवा करने पलायन कर जाएगे। खतरनाक साजिश है इन बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों का जो भारत को खुलेआम लाखों हाथों से लूट रही है। सब कुछ जानते हुए भी तुम मूक पशु की भाँति घर में सोये हो। जागो, वरना तुम्हारे जैसे मूक प्राणियों की ही बलि चढ़ती है? इस भाषण से क्रोधित विदेशी धन के देशी चौकीदार ने उसे डंडे से हकाला। लाठी में सबको अपना गुलाम बनाने का दम होता है। आखिर इन हवेलियों तक आवाजें कहाँ पहुचती है। अंग्रेजों भारत छोड़ो का स्वर और प्रबल हो गया। इस देश की माटी पुन: पदाक्रांत हो रही है। अरे, यह देश ही नहीं रहेगा तो तुम कहाँ रहोगे ? अब तुम्हें ही गांधी, तिलक, सुभाष, भगत बनना है। वे फिर से नहीं आएंगे। आओ, मेरे साथ बोलो - जय हिन्द, तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा, स्वराज्य मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है ....।
अल सुबह मासूम बच्चे फिर उसके पीछे हो चले कुछ अधनंगे, कुछ हाथ में पत्थर लिए कभी उनके साथ खेलते, नारे लगाते तो कभी पत्थर मारकर भाग जाते। भला उन्हें क्या पता कौन है- षड्यंत्रकारी ? कभी दुनियां के भारत विरूद्ध षड्यंत्र के समक्ष वह पर्वत की भांति अकेला खड़ा था। घटनाएँ, नीतियाँ शासन ऋतुओं की तरह गरजते - बरसते गुजर गई। वह अब भी वहीं उत्थान और पतन से ऊँचा उठा हुआ। भारतीय ऐश्वर्य को विकृत करने वाले लोगों के विरूद्ध संघर्ष करते अकेले सेनानी ने अपनी नींद, शांति, चैन, आराम, सुख सब कुछ खो दिया था। गंभीर, स्नेहमयी, ओजयुक्त वाणी की अजीब सी कशिश की, न चाह कर भी कुछ समय तक उसे सुनने को जी चाहता था परन्तु लोग तो उसे पागल कहते थे।
वह मास्टर राममिलन था। जिसे इज्जत और सम्मान से लोग रामू गुरूजी कहते थे। श्रद्धा, स्नेह, विश्वास और प्यार का वह छलकता सागर थे। गाँव के हर छोटे - बड़े को कुशलक्षेम पूछना, सलाह मश्विरा देना उनकी आदत थी। माटी के लोंदे में जीवन डालने की अदभूत कला कौशल के वे सृष्टा थे। माटी उनकी हाथों में साँसें लेकर जीवन पाता और वे स्वयं प्रतिमा को सजीव करते हुए बेजान से निर्जीव हो चले थे। निश्चित ही बिना गढ़े माटी की कोई कीमत नहीं, गढ़कर, वह प्रतिमा बनती है। आराध्य वस्तु हो जाती है। उनकी कीर्ति उनके शिष्यों में दमकती थी वे एक स्वर्णिम युग के जीवाश्म थे। मानव जीवन में सुख - दुख, आशा - निराशा, पीड़ा - आनंद,बहुत पास - पास रहते हैं। हम सभी ऊपर वाले की कठपुतली हैं और इस दुनिया के रंगमंच पर अपनी - अपनी भूमिकाएं निभाकर पर्दे के पीछे चले जाएंगे। नियति ने उसके ऊपर भी परीक्षाओं का ऐसा जाल फेंका कि उनका जीवन स्वयं एक परीक्षा बनकर रह गया था। ये तो रामू गुरूजी ही थे, जिन्होंने प्रकृति के इन झंझावतों के बीच अपने पैर अंगद की तरह जमाए हुए हर बार पास होते रहे। सरस्वती को जन्म देते उनकी पत्नी ने उसका साथ छोड़ दिया। गाँव में चिकित्सा सुविधा नहीं थी। गाँव में तो डाक्टर आना ही नहीं चाहते, ये तो शिक्षक ही हैं जो गाँव में रहते हैं। अस्पताल बनाने की उनकी हर कोशिश नाकाम हो गई थी। सीने पर पत्थर रखकर उन्होंने सरस्वती और विकास दोनों को माँ बनकर पाला, बाप बनकर दुलारा। अब विकास बड़ा हो गया था। विश्वविद्यालय में डांक्टरेट कर रहा था। कुछ माह से पैसे की बढ़ती माँग ने चिंता की लकीरें माथे पर उभार दी थीं। वह शहर जाने को तैयार हुए ही थे कि दूरभाष से खबर आई कि विकास नहीं रहा। नशे के सौदागरों ने उसे लील लिया था। पहली बार गाँव वालों ने उनकी आँखों में क्रोध और नफरत का सैलाब देखा था। प्रकृति की इस परीक्षा से निपटकर उसकी सारी आशाएँ सरस्वती पर टिक गई थी। बदलते समय में अब वह बड़ी हो चली थी, विवाह के प्रस्ताव आने लगे। उनकी बड़ी - बड़ी खूबसूरत हिरनी सी आँखों में ब्रम्हांड समाया था। बोलती तो शहद टपकते। उसकी खूबसूरती पर कामदेव भी न्यौछावर हो जाये। उस पर सारे गाँव को गर्व था।
एक कम्प्यूटर व्यापारी के साथ दूर शहर में विवाह तय हो गया। अपनी बेटी की शादी का निमंत्रण बाँटते, चाँवल - हल्दी - सुपारी व पत्रिका देते हुए आज रामू गुरूजी बहुत खुश थे। मित्र शिवपाल पोष्ट मास्टर को पत्रिकाओं का एक पुलिन्दा जल्दी पोष्ट करने को कहता हुआ दिया - दूर के रिश्तेदारों के लिए। वे छोटे - बड़े सभी को, चौधरी, पटेल, गौटिया, मजदूर, किसान, चरवाहा, दर्जी, साहूकार को आमंत्रित करता, कहता कि अपनी बेटी की शादी में अवश्य आना, रविवार को बारात आ रही है। सारी व्यवस्था आपको करनी है। बड़ी सुन्दर जोड़ी है। मैं अकेला क्या - क्या करूंगा ? सभी ने सहमति जताई, पूरा गाँव प्रसन्न था। मिठाईयाँ की महक आ रही थी। गाँव में पहली बार बैंड बाजा बजेगा, आर्केस्ट्रा भी है। सारी तैयारियाँ हो गई थीं। दाऊ महाराज भी अपने पूजन सामाग्री सहित दो दिन से व्यवस्था में दिख रहे थे। कोटवार ने मुनादी कर दी थी कि रविवार को किसी के घर चूल्हा नहीं जलेगा।
इस हर्ष के बीच शोक भी किनारे से ही निहार रही थी, फिर एक परीक्षा होने वाली थी। टेलीफोन की घंटी के घनघनाने से सब चौंके, गुरूजी ने सुना तो चीख मारकर बेहोश हो गया। पानी छींटा मारने पर वह होश में आया। उन्होंने होश में आने के बाद रूंधे गले से बताया कि बारात ट्रेन से आ रही थी। आतंकवादियों के समूह ने ट्रेन को बम से उड़ा दिया, सारे बाराती... सब कुछ खत्म .... कोहराम मच गया। परिजनों ढांढस बंधाया। गुरूजी खामोश ईश्वर को याद करने लगे कि तुम किस जन्म के पाप की सजा दे रहे हो, मुझे। ये कैसी परीक्षाएँ मेरी लेते हो बार - बार ? क्या परीक्षा लेना - देना मेरी ही ठेका है ? कभी उनकी भी ले जो लूटकर भी ऐश कर रहे हैं। चित्कार के बीच खामोश अपराधी की भाँति ईश्वर के फैसले को स्वीकार करते हुए किंकर्तव्यविमूढ़ खड़े हुए थे गुरूजी। कहीं कोई इसके लिए अपील भी तो नहीं की जा सकती थी। उसके दरबार में हर किसी को पुनर्मूल्यांकन हेतु आवेदन का हक भी नहीं। वह भक्तों को जल्दी पास बुला लेता है। लाशों के ढेर में उन्होंने अपने होने वाले दामाद को पहचान कर जो दहाड़ लगाई फिर खामोश हो गये। लोग कहते हैं वे पागल हो गये। इस बार जीवन की परीक्षा में उन्हें पूरक मिला था। चिकित्सा विज्ञान उन्हें ठीक करने में नाकाम रहा। सरस्वती ने बेटे की तरह फर्ज निभाया। शहर में इलाज कराते वह नौकरी करने लगी। उसकी शिक्षा के बूते एक निजी बैंक में कम्प्यूटर चलाने का काम मिला था , इसी से गुजारा होने लगा। एक नई खोज की दवा ने कुछ उम्मीदें बाँधी वे कुछ शांत रहते खाना भी खा लेते थे। मानों बुझने के लिए दीपक भभक रहा हो। एक और वज्रपात होने को था। बैंक में डकैती हो गई, सुरक्षा स्वीच दबाते सरस्वती वहीं शहीद हो गई, आखिर स्वतंत्रता सेनानी का खून रंग लाया। बैंक लूटने से बचा। मरणोपरांत सेनानी के लिए पुरस्कार स्वरूप एक मेडल गुरूजी के धड़कते सीने पर टाँग दिया गया। बेटी की यादों को दिल में संजाये , विदेशी मेडल को गुरूजी ने मुट्ठी में भींच लिया फिर जोर से चीखा - जयहिन्द ...। मानो क्रोध को पी जाना चाहते हो। नपुंसकों की ताली बजाती गुलाम भीड़ की आवाज में उनकी आवाज दब गई। वे बोझिल मन से सभास्थल से निकलकर सीधे गाँव पहुंचे। विद्यालय पहुंचकर उन्होंने फिर चीखकर भाषण दिया, नारे लगाये, जन - जागरण का कार्य किया। महान विपत्तियों में भी वे अपने धर्म का निर्वाह करते रहे, सत्यवादी हरिश्चन्द्र की तरह। हम सब एक हैं, भारत माता की जय और मेरा भारत महान फिर खामोशी छा गई। गाय, कुत्तों ने उन्हें उठाने की भरपूर कोशिश की न उठने पर उनका कर्ण भेदी स्वर सबको सचेत कर गया कि रामू गुरूजी अब अपने जीवन की अंतिम परीक्षा में भी पास हो गए, वह भी मेरिट लिस्ट मे ....
  • पता - जे.पी.रोड, बसना (छग.)

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