इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

गुरुवार, 9 मई 2013

त महूं बनेव समाज सुधारक



  • आनंद तिवारी पौराणिक
परन दिन बल्लू नाऊ के सेलून म समाज सुधारक संगी संग भेंट होगे। वो हा बीड़ी के धुंगिया ल मोर डहर फूंकत मोला ताना मारिस - अरे यार, तंय का कवि बने हावस, तोर कविता लिखे ले का समाज ह सुधरही। वोखर बर मोर कस समाज सुधारक बन जा, तभे देस, दुनिया के बुराई मन मेटाही। मोला वोखर बात बानी ह काँटा कस गड़गे वो हा त मोला चना के झाड़ म चघा दिस। चना के त नान - नान पौधा होथे। फेर दुनिया वाले मन वोखर झाड़ घलो बना देथें। एक ठन कहिनी म पढ़े रेहेंव के खीरा के रूख म अब्बड़ खीरा फरे रिहीस। त ये बात ह वो दिन मोर समझ म नइ आइस, आज समझ गेंव के जब चना के झाड़ होथे त खीरा के रूख काबर नइ होही। मंय ह बन गेंव  समाज सुधारक। खद्दर के सफेद कुरता, पैजामा पहिरेंव अऊ कांध म डारेंव लटकू झोला। संवागत समाज सुधारक बनगे, फेर ये समझ नई आइस के समाज सुधार ल कती ले चालू करंव। त मोला सुरता आइस के कोनो भी कारज ल अपन परोस ल चालू करना चाही।
नगर पालिका ह सड़क अऊ रद़दा के तिर - तिर, खराब पानी बोहाय बर नाली बनाय हे। फेर लोगन डारथें वोमा कचरा, कागद अऊ जम्मों गन्दा जिनिस। नाली ह बजबजा जाथे। बस्साये, माखी, मच्छर, कीरा मकोड़ा हो जाथे। डेंगू अऊ मलेरिया फइल जाथे। त सबो झन गारी देथय सरकार ल। मंय ह परोसी मन ल इही बात बतायेंव अऊ नाली ल साफ राखे बर कचरा डारेबर बरजेंव त लड़ंकिन परोसी डोकरी ह मोर सात पुरखा ल बखान डारिस अऊ मोर आँखी के देखते कचरा ल बाहरिस अऊ नाली म झर्रा दिस। तभो ले मंय ह हिम्मत नइ हारेंव। नल म पानी भरइया माई लोगन ल लाईन म पानी भरे बर कहेंव त मोरे बर पानी बंद होगे। पढ़इया मन ल टी.वी. देखे बर बरजेंव त मोरे टी.वी. देखना बंद होगे। इसकुल के लइका मन ल माखुर, गुटका, सिगरेट बर बरजेंव त वोमन ह लहुट के मोला किहिन - पहिली तंय ह दिन भर चाय पियई ल बंद कर त हमन ल सिक्क्षा देबे। मंय ह अपन जम्मो पीरा ल समाज सुधारक संगी ल बतायेंव त वोहा मोर पीठ ल ठोंकत बोलिस - तंय फिकर झन कर यार, हिम्मत ले काम कर। चल पान खाबोन। अइसन कहत मोला खींचत पान ठेला म लेगे। वोहा जरदा, माखुर वाला पान ल चबाईस, पाऊच ल दाँत म काट के वोमा भराये जर्दा ल मुँह मं फाँका मारिस। मंय ह लौंग, इलाइची चबात रेहेंव। वोहा पचाक ले थूकिस। बाजू म खड़े मनखे के फुलपेंट म थूक छटकगे। माखुर- गुटका के गंध ह हवा म बगरगे। मोर जीव खलबलागे, लगिस के मंय ह उछर डरहूं फेर रूमाल ल मुँह म ढाँके अपन मन ल समझायेंव। मंय संगी ले बिदा मांगेंव त किहिस - अरे सुन न यार, काली मोर इंजीनियर टुरा ल देखे बर लड़की के ददा - दाई मन आहीं, मंझनियां बेरा। तहूं आबे।
बिहान दिन मंझनिया मंय ह समाज सुधारक संगी के घर म गेंव। थोरिक बेर म चमचमात कार म सगामन पधारिन। समाज सुधारक संगी ह अपन घरवाली संग, वोमन के सुआगत करिस। सोफा म बइठाइस। लस्सी, ठंडा सरबत अऊ नमकीन - मिठई रखिन। सगामन ह लड़का ल देखिन त परसन्न हो गे। वोमन किहिन - हमन ल ये रिस्ता ह पसंद हे। वोमन जाय बर ठाढ़ होइस त समाज सुधारक संगी ह बोलिस - आप बने फोर के गोठ बात त नइ करेव सगा।
सगा किहिस - भई, आप मन तो ये छेत्र के समाज सुधारक हव। सादा ढंग ले आदर्स बिहाव करबो, अऊ समाज ल नवा रद़दा देखाबों। ओखर गोठ ल सुनके समाज सुधारक संगी ह बगियागे अऊ अपन हाथ के मिठई के पलेट ल पटक के किहिस - मंय ह आप मन ल समझदार समझत रेहेंव, फेर अइसन नइ लागय। सुन लव अपन कान ल खोल के, दुनिया ल देखाये बर भले हमन आदर्स बिहाव करबो फेर भीतरी - भीतरी तुमन तीन लाख नगदी, एक ठन कार अऊ पन्द्रह  तोला सोना देहू। कहव, तुमन ल मंजूर हे के नहीं ? टुरी के दाई - ददा मन रूआँसू होगें, फेर का करतिन वोमन तईयार होगे। समाज सुधारक संगी के ये दे बेवहार मोला बने नइ लागिस, फेर पर के घरेलू गोठ म महूं नइ गोठियाय सकेंव।
मोर समाज सुधारक वो संगी ह थोरिक दिन बाद म समाज सुधारक मन के एक ठन बड़े सभा म सहर लेगिस। बड़े - बड़े पण्डाल लगे रहय। जगर - मगर बिजरी झालर सजे रहय। दुरिहा - दुरिहा ले समाज सुधारक मन बड़े - बड़े गाड़ी, मोटर, कार म आइन। महंगी होटल म दारू, कुकरी खाईन। भासन ऊपर भासन देइन। कतक ो रूपिया पानी कस बोहागे। मंय ह समाज सुधारक संगी ल कहेंव = संगी ये देखावा अउ ढोंग करे ले का फायदा ? हमरे कथनी अउ करनी एक नइये त दुनिया ह कइसे सुधरही ? संगी हंस के गोठ ल हल्का बना दिस। किहिस - देख भाई, जईसन हलवाई ह अपन मिठई ल नइ खावय, वइसने हमर सिक्छा ह हमर मन बर नोहय।
तभे मंय ह समझेंव के मनखे मन पाठ पूजा करथे। फेर जिनगी म बेईमानी, छल, कपट अऊ सोसन ल नइ छोड़य। दूध म पानी मिलई, खाय पिये के जिनिस अऊ दवई म मिलावट करके पइसा कमाय देखाय बर जग, हवन, परबचन कराथें। तरिया ल पाटके काम्पलेक्स बनाथे। किराया म लाखों कमाथें। रूख, राई ल काटके घर म प्लास्टिक के फूल सजाथे। सबो त गड़बड़ हे रे भाई। कथनी आन, करनी आन। तइहा के सियान मन तरिया बनवावंय, पेड़ पौधा लगवावंय। गरमी म पियाऊ खोलय, पियासे मन ल पानी पियावंय। मोर नजर ह एक ठन किताब म लिखे ये गोठ म परिस - अरे बइहा, तंय ह दुनिया ल सुधारने वाला कोन होथस ? तंय खुद सुधर जा, दुनिया ह सुधर जाही।
मंय ह तुरते समाज सुधारक के बाना ल छोड़देंव, अऊ अपन जुन्ना रद्दा म रेंगे लगेंव।

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