इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

मंगलवार, 2 जुलाई 2013

इसलिए विदा चाहते हैं हिन्‍दी को


  • प्रभु जोशी
       दरअसल अस्मिता की इन दिनों एक नई और माध्यम निर्मित अवधारणा को प्रस्तुत करते हुए उसका प्रचार और वकालत की जा रही है। यूँ भी अब वही सबको परिभाषित करता है और तमाम जीवन और समाज के तमाम मूल्यों का प्रतिमानीकरण करने का औजार बन चुका है। दूसरी तरफ हम अपनी सनातन रूढ़ सांस्कृतिक आत्मछवि से इतने मोहासक्त हैं कि प्रत्यक्ष और प्रकट पराजय को स्वीकारना नहीं चाहते हैं। बर्बर उपनिवेश के विरूद्ध लड़ने की निरन्तरता को जीवित बनाये रखने के लिए ऐसी अपराजय का अस्वीकार पराधीनता के दौर में राष्ट्रवाद की नब्जों में प्राण फूंकने के काम आता है। कुछ है कि हस्ती मिटती ही नहीं ... तब यह दम्भोक्ति अचूक और अमोघ बनकर काम करती थी। जन - जन को जोड़ने और जगाने का जुमला था ये कि लगे रहो भैया। निश्चय ही उस दम्भोक्ति ने ब्रिटिश उपनिवेश के विरूद्ध संघर्ष में समूचे राष्ट्र को लगाये रक्खा और हमने अंग्रेजों को हकालकर बाहर कर दिया। लेकिन वह अपने दंश का जहर खून में इस कदर शामिल कर चुका था कि हम आज हिन्दी को हिन्दी से इंग्लिश बनाते देख रहे हैं कि कहते हैं कि कुछ नहीं होगा। हर हाल में बची रहेगी। हस्ती है कि मिटती नहीं कहते हुए हम यह लांछन अपने माथे पर लेने के लिए तैयार है कि हमने अपनी भाषा को अपने सामने दम तोड़ते हुए देखा और कुछ नहीं किया।
       कहने की जरूरत नहीं कि युद्धातुर उतावली से गुरूचरण दास जैसे लोग तर्कों में बार - बार डेविड क्रिस्टल की पुस्तक लेंग्विज डेथ का हवाला इस तरह देते हैं, जैसे वह भाषा की भृगु - संहिता है। जिसमें भाषा की मृत्यु की स्पष्ट भविष्योक्ति है - अत: आप हिन्दी की मृत्यु को लेकर छाती - माथा मत कूटो। जबकि इससे ठीक उल्टा बुनियादी रूप से वह पुस्तक भाषाओं के धीरे - धीरे क्षयग्रस्त होने को लेकर गहरी चिंता प्रकट करती है। भाषाई उपनिवेश लिंग्विस्टिक इम्पीयरिलिज्म के खिलाफ सारी दुनिया के भाषाशास्त्री को सचेत करती है पर हिन्दी वाले हैं कि सुन्न पड़े हैं। हिन्दी साहित्य संसार में विचरण करने वाले साहित्यकार तो तेरी कविता से मेरी कविता ज्‍यादा लाल में लगे हुए हैं या हिन्दी की वर्तनी को दुरूस्त कर रहे हैं। जबकि इस समय सबको मिलजुलकर इस सुनियोजित कूटनीति के खिलाफ कारगर कदम उठाने की तैयारी करनी चाहिए।
       बहरहाल, इस सारे मामले पर एक व्यापक राष्ट्रीय विमर्श की जरूरत है। हमें याद रखना चाहिए कि कई नव स्वतंत्र राष्‍ट्रों ने अपनी भाषा को अपनी शिक्षा और आधुनिक ज्ञान - विज्ञान की भाषा बनाया। इसलिए आज उनके पास उनका सब कुछ सुरक्षित है। हमने अपनी राजनीतिक भीरूता के चलते भाषा के मसले पर पुरूषार्थ नहीं दिखाया। इसी की वजह है कि हमसे आज का ये धोखादेह समय हमारे सर्वस्व को जिबह के लिए माँग रहा है। आज हमारी आजादी वयस्क होते ही राजनीति के ऐसे छिनाले में फंस गई है कि सारा देश मीडिया में चल रहे व्यवस्था का मुजरा देख रहा है। पूरा समाज मीडिया और माफिया आपरेटेड बन गया है। अब मीडिया ही आरोप तय करता है। वहीं मुकदमा चलता है और अंत में अपनी तरह से अपनी तरह का फैसला भी सुनाता रहता है और विडबंना यह है कि वह यह सब जनतंत्र की दुहाई देकर करता है। जबकि अपनी आलोचना का हक वह किसी को नहीं देता और अपने आत्मावलोचन के लिए तो उसके पास समय ही नहीं है।
       राजनीति ने तो भाषा, शिक्षा, संस्कृति जैसे प्रश्रों पर विचार करना बहुत पहले ही स्थगित कर रखा है। भारत में राजनीति एक नया पूँजी निवेश का क्षेत्र है। इसलिए वह तो देश को बाजार तथा एन.जी.ओ. के भरोसे छोड़कर मुक्त हो गई है। यों भी उसमें प्रविष्टि की अर्हता हत्या और घूस लेकर कानून के शिकंजे से सुरक्षित बाहर आ जाना हो गया है - और जो इन अर्हताओं से रहित हैं, वे देश को एक प्रबंध संस्थान की तरह चलाने को भूमण्डलीकरण की वैश्चिक दृष्टि मानते हैं और वे उसके राजनीतिक प्रबंधक का काम कर रहे हैं। वह राजनीतिक संस्कृति की समाज से विदाई की घड़ी है। जिसने संस्थागत अपंगता को असाध्य बन जाने की तरफ हॉक दिया है। हम क्या थे ? हम क्या हैं और क्या होंगे अभी ? जैसे प्रश्रों पर बहस करना मूर्खों का चिंतन हो गया है। जबकि ये प्रश्र शाश्वत रहे हैं और हमसे ही उत्तरों की माँग करते रहेंगे। इसलिए हमें अपने  इतिहास को जीवित बचाकर रखना जरूरी है। क्योंकि भविष्य का जब सौदा होगा उसमें हमारी कम हमारे अतीत की भूमिका बहुत बड़ी होती है। वरना वह भाषा की मृत्यु के साथ दफन हो जायेगा। वे हमें हालीवुड की तरह भविष्यवादी फंसातियों में जीने के लिए तैयार किये दे रहे हैं।
       कुछ दिनों पूर्व विश्व हिन्दी सम्मेलन हुआ। उसमें तालियॉ कूटने के बजाय इस प्रश्र पर बहुत शिद्दत से सोचा जाना चाहिए था कि क्या हम शेष संसार के मुल्क बोस्निया, जावा, चीन, आस्ट्रिया, बल्गारिया, डेनमार्क, पुर्तगाल, जर्मनी, ग्रीक, इटली, नार्वे, स्पेन, बेल्जियम, क्रोएशिया, फिनलैण्ड, फ्रांस, हंग्री, नीदरलैण्ड, पौलेण्ड या स्वीडन की तरह अपनी ही मूल भाषा में शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्र के लिए जगह बनाने के लिए क्या कर सकते हैं। क्योंकि बकौल सेम पित्रौदा सिर्फ एक प्रतिशत ही है जो लोग अंग्रेजी जानते हैं या कि हमें अफ्रीकी उपमहाद्वीप की पीड़ा का पर्याय बनाना है। उसने कहा कि जब ये नहीं आए थे तो हमारे पास हमारी कृषि, हमारा खानपान, हमारी वेशभूषा, हमारा संगीत और हमारी अपनी कहे जाने वाली संस्कृति थी - इन्होंने हमें अंग्रेजी दी और हमारे पास हमारा अपने कहे जाने जैसा कुछ नहीं बचा है। हम एक त्रासद आत्महीनता के बीच जी रहे हैं।
       हमारी हिन्दी पत्रकारिता को सोचना चाहिए कि विदेशी धन और खुद को मीडिया मुगल बनाने के बजाय यह सोचे कि अन्तत: भारतीय भाषाओं को आमतौर पर और हिन्दी को खासतौर पर हटाकर वह देश को आत्महीनता के जिस मोड़ की तरफ घेरने जा रही है। वह उस कल्चरल इकोनॉमी की सुनियोजित युक्ति है, जो एक नव उपनिवेषवाद से जन्मी हैं। इसके साथ ही यह भी सोचें कि कहीं ऐसा न हो कि केवल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की आरती उतारने वाले भर रह जायें और देवपुरूष कोई अन्य हो जाये। बाहर की लक्ष्मी आयेगी तो वह विष्णु भी अपना ही लायेगी। आपके क्षीरसागर के विष्णु सोए ही रह जायेंगे।
       क्या हमारी भारतीय भाषाओं के साथ हिन्दी के ये हिंग्लिशियाते अखबार इस पर कभी सोचते हैं कि पाओलो फ्रेरे से लेकर पॉल गुडमेन तक सभी ने प्राथमिक शिक्षा के सर्वश्रेष्ठ माध्यम को मातृभाषा ही माना है और हम हिन्दुस्तानी हैं कि हमारे रक्त में रची - बसी भाषा को उसके मास मज्जा सहित उखाड़कर फेंकने का संकल्प कर चुके हैं। दरअसल, औपनिवेशक दासत्व से ठूँस - ठूंस कर भरे हमारे दिमागों ने हिन्दी के बल पर पेट भर सकने की स्थिति को कभी बनने ही नहीं दिया, उल्टे धीरे - धीरे शिक्षा में निजीकरण के नाम पर शहरों में गली - गली केवल अंग्रेजी सिखाने की दुकानें खोलने के लिए लायसेंस उदारता के साथ बाँटे गये। उन्हें इस बात का कतई इल्हाम नहीं रहा कि वे समाज और राष्ट्र के भविष्य के साथ कैसा और कौन सा सलूक करने की तैयारी करने जा रहे हैं। पूंजीवादी भूमण्डलीकरण से देश स्वर्ग बन जायेगा। ऐसी अवधारणाएँ हिन्दी में अधकचरे ग्लोबलिस्टों की इतनी भरमार है कि वे एक अरब लोगों के भविष्य का मानचित्र मनमाने ढंग से बनाना चाहते हैं, और दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि पूरा देश गूंगों की नहीं अंधों की शैली में आँख मीचकर गुड़ का स्वाद लेने में लगा हुआ है। उनकी व्याख्याओं में भाषा की चिंता एक तरह का देशीवाद है जो भूमण्डलीकरण के सांस्कृतिक अनुकूलन को हजम नहीं कर पा रहा है। वे इसे मरणासन्न देसीवाद का छाती - माथा कूटना कहकर उससे अलग होने के लिए उकसाने का काम करते हैं ताकि अंग्रेजी के विरूद्ध कहीं कोई भाषा - आंदोलन खड़ा न हो जाए।
       भारत में सूचना प्रौद्योगिकी के अवतार पुरुष होने का जो डंका पीटा जाता है उसके बारे में एक अमेरिकी विशेषज्ञ ने एक वाक्य की टिप्पणी में हमारी औकात का आंकलन करते हुए कहा कि भारत के आई.टी. आर्टिजंस तो आभूषणों की दूकानों के बाहर गहनों को पालिश करके चमकाने वाले लोग भर हैं। माइक्रोसाफ्ट उत्पाद बनाता है और भारतीय उसे केवल अपडेट करते हैं। यह वाक्य हमारे सूचना सम्राट होने के गुब्बारे की क्षणभर में हवा निकाल देता है और दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक बात यह है कि हम इसी के लिए आई.टी. आर्टिजंस के लिए अपनी भाषाओं को मार रहे हैं। हम चमड़े के लिए जिंदा गाय मारने पर आमादा है।
       यदि हमें हिन्दी को आमतौर पर और तमाम अन्य भारतीय भाषाओं को खासतौर पर बचाना है तो पहले हमको प्राथमिक शिक्षा पर एकाग्र करना होगा और विराट छद्म को नेस्तानबूत करना होगा। जो बार - बार ये बता रहा है कि अगर प्राथमिक शिक्षा में पहली कक्षा से ही अंग्रेजी अनिवार्य कर दी जाये, तो देश फिर से सोने की चिड़िया बन जायेगा। जहाँ तक भाषा में महारथ का प्रश्र है। संसार भर में हिन्दुस्तान के ढेरों प्रतिभाशाली वैज्ञानिक उद्योगपति और रचना लेखक रहे हैं। जिन्होंने अपनी आरंभिक शिक्षा अंग्रेजी में पूरी नहीं की। इसके साथ सबसे महत्वपूर्ण और अविलम्ब ध्यान देने वाली बात यह है कि प्राथमिक शिक्षा में निरन्तर बढ़कर विकराल होते निजीकरण पर भी सफल नियंत्रण पाना होगा। तभी हम अपना जैसा कहे जा सकने वाला थोड़ा बहुत सुरक्षित रख पाने की स्थिति में होंगे। भारतीय भाषाओं को रोमन लिपि में बदलने का परिणाम यह होगा कि आने वाले पच्चीस वर्ष बाद हमारी हजारों सालों की भारतीय भाषाएँ बच्चों के लिए केवल जादुई लिपियाँ होंगी। इसलिए अगर हमें अपनी भाषाओं को बचाना है तो ऐसे सुनियोजित षड़यंत्र के खिलाफ हर उस आदमी को उन अखबारों को व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से पत्र लिखे जाने का निरंतर अभियान चलाया जाना चाहिए और उन्हें कहना चाहिए कि वे भाषा के खिलाफ किये जा रहे इस विराट छल को अविलम्ब स्थगित करें अन्यथा वे उसे पढ़ना बंद कर देंगे। भाषा भी राष्ट्र की धरोहर है और उन्हें नष्ट करने की कोशिशें राष्टद्रोह से कोई छोटा अपराध नहीं है। मुझे लगता है। यही आखिर वक्त है। जब उत्सवधर्मी मानसिकता के खिलाफ आंदोलन धर्मिता के लिए पर्याप्त अवसर और अवकाश बनायें।

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