इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 1 जून 2013

मोर धरती के पूजा ...


  • गोपाल दास साहू
मोर धरती के पूजा करइया एक झन दिखथे गा
बाकी मोला दिखथे खुर्सी के टोरइया
नागर - कोप्पर लथपथ होथे, बइला - भइंसा सदबद होथे।
गोबर खातु राख गिल्ला हम कमाथन माई पिल्ला
भरे बरसात म बासी खाके
आगी के तपईया॥ मोर धरती के पूजा करइया ...॥

माड़ी भर पानी में खड़े रथे, मोरा - खुरमी ओढ़े रथे
नई डरे साँप डेरू ल धान के निंदइया
चिखला फुगड़ी खेले
जांगर के टोरइया॥ मोर धरती के पूजा करइया ...॥

झुमर - झुमर के धान लुवत रहिथे, सीत म पसीना चुहत रहिथे
निहर - निहर के भारा बांधे सुर के बोहइया
पड़की करमा सुवा ददरिया
खेत के गवईया॥ मोर धरती के पूजा करइया ....॥

ठक - ठक - ठक दांत बाजे, मारे जाड़ म चोला काँपे
खोररा खटियां गोरसी पहीरे लंगोटी पेरा भीतर
कहाँ पाही मच्छरदानी
कमरा के ओढ़इया॥ मोर धरती के पूजा करइया ....॥

धकधक, धकधक घाम लुरे, तीपत भोंभरा देहे लुथरे
सरी मंझनियाँ खेत - खार में कमाथे मुड़ी पछीना गोड़ चुहाथे
तामेश्वर संगी मोर
गोपाल संग रहईया॥ मोर धरती के पूजा करइया ...॥
भंडारपुर करेला,
पो.- ढारा, व्हाया - डोंगरगढ़, जिला - राजनांदगांव (छग.)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें