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इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

सोमवार, 3 जून 2013

बचा - बचा के नज़र


  • अब्दुस्सलाम ' कौसर' 
बचा - बचा के ऩज़र आंख भर के देखते हैं
वो आइना जो कभी बन संवर के देखते हैं

वो उसके हुस्न की मासूमियत सुब्हानल्लाह
सुना है उसको फ़रिश्ते ठहर के देखते हैं

बलाएं लेती है उसका बहारे सुब्हे - चमन
वो यूं ही जब कभी जलवे सहर के देखते हैं

नहा के जब वो निकलता है जु़ल्‍फ बिखराए
तो उसको भागते बादल ठहर के देखते हैं

ये किसकी याद में रोता है कौन छुपछुपकर
चलो कि इसकी भी तहक़ीक कर के देखते हैं

जला के शमा कभी ताक पर जो रखता है
तो उसकी शक्ल पतंगे ठहर के देखते हैं

कोई रकीब है मेरा न मैं किसी का रकीब
न जाने क्यों मुझे कुछ लोग डर के देखते हैं

सुना है बनती है किस्मत वहाँ गरीबों की
सो उसकी बज्‍़म में हम भी ठहर के देखते हैं

सुना है उसको अयादत का श़ौक है कौसर
सो अपने आप को बीमार कर के देखते हैं
  • स्टेशन पारा, राजनांदगांव (छग.) 

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