इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

सोमवार, 3 जून 2013

बचा - बचा के नज़र


  • अब्दुस्सलाम ' कौसर' 
बचा - बचा के ऩज़र आंख भर के देखते हैं
वो आइना जो कभी बन संवर के देखते हैं

वो उसके हुस्न की मासूमियत सुब्हानल्लाह
सुना है उसको फ़रिश्ते ठहर के देखते हैं

बलाएं लेती है उसका बहारे सुब्हे - चमन
वो यूं ही जब कभी जलवे सहर के देखते हैं

नहा के जब वो निकलता है जु़ल्‍फ बिखराए
तो उसको भागते बादल ठहर के देखते हैं

ये किसकी याद में रोता है कौन छुपछुपकर
चलो कि इसकी भी तहक़ीक कर के देखते हैं

जला के शमा कभी ताक पर जो रखता है
तो उसकी शक्ल पतंगे ठहर के देखते हैं

कोई रकीब है मेरा न मैं किसी का रकीब
न जाने क्यों मुझे कुछ लोग डर के देखते हैं

सुना है बनती है किस्मत वहाँ गरीबों की
सो उसकी बज्‍़म में हम भी ठहर के देखते हैं

सुना है उसको अयादत का श़ौक है कौसर
सो अपने आप को बीमार कर के देखते हैं
  • स्टेशन पारा, राजनांदगांव (छग.) 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें