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बुधवार, 26 जून 2013

लेखक बने के संउख


  • सुशील भोले

हमर पारा के खोरकिंजरा ल एक दिन लेखक बने के भूत धर लिस। मोला कहिथे - भाई जी, तोर नांव संग फोटू ल जम्मो कोती के पेपर - सेपर मन मा छपत देखथौं, त महूं ल अइसने कुछु - कांही करे के सउंख लागथे। बनतीस ते महूं ल अपने असन लेखक बना देतेस का ?
मैं थोरकन गुनेंव, फेर सोचेंव - आजकल चेला - उला मिलना ह बड़ा भाग के बात आय। गुरु तो कतकों मिल जथें, फोकट छाप उपदेश झड़इया, फेर चेला कहां मिलथे, जेन अपन गुरु के बात ल बने चेत लगाके सुनय, वोला धरय अउ फेर वोकरे रस्ता म रेंगय। मैं झट कहेंव - हौ - हौ, मैं तोला लेखक बना देहूं। फेर कोन किसम के लेखक बनना हे तेला तो तुंहीच ल तय करे बर लागही।
खोरकिंजरा अचरज म बूड़ के कहिस - अच्छा, लेखक घलोक कई किसम के होथे गा ? मोला तो लागत रिहीसे, जइसे नेता मन के एके प्रजाति के लबरा अउ बेईमान होथें, तइसने लेखक मन घलोक हाहा - भक भक अउ चापलूसी करइया होवत होही कहिके।
मैं वोला समझाएंव - अरे नहीं रे खोरकिंजरा, लेखक मन कई किसम के होथे। जइसे मंच मन म कूद फांद के कवि नाचा करइया, नेता मन के सभा - सम्मेलन म जा के भजन - आरती गवइया, पेपर - पतरिका वाले मन के गोड़ ल धरके चरन भाट गिरी करइय्या, गरीब - गुरबा मन के दुख पीरा ल धर के वोकर नांव म चंदाखोरी करइया। अउ ए सबले ऊंच होथे सरकारी पद - पइसा म बइठ के सरकारी सम्मान ल झोंकने वाला युगपुरुष बन जवइया।
- अच्छा, त युगपुरुष बन जवइया लेखक ह सबले ऊंच होथे गा। एकर समाज म भारी मान - सम्मान होवत होही न ?
- अरे नहीं बइहा, सरकारी मंच मन मा होथे गा। अइसन लेखक मन ला समाज म फूटे आंखी तक नइ देखे जाय।
- वाह भई, जब समाज म फूटे आंखी नइ देखे जाय त सबले ऊंच कइसे होइस ?
- अरे सरकारी नजर ले रे बइहा। समझस नहीं। जे मन अपन झोंके पइसा के आधा ल सरकारी तंत्र के खीसा म खुसेर देथें ते मन सबले ऊंच होथे गा, भले वोमन ल लिखे - पढ़े ल झन आवय।
- अच्छा त अइसने ऊंचहा बने बर महूं ल काहज हस गा।
- हहो रे भई ...। सोहलियत परथे न।
- अच्छा त मोला युगपुरुष वाला लेखक बने बर का - का करे ले लागही तेला बता ?
- हां, त चेत लगा के सुन, सबले पहिली तैं ह मोला दू डांड़ के कविता लिख के देखाबे। विषय हे - आज के नेता। एकर पाछू एक ठन किताब लिखना हे, जेला दू अलग - अलग नांव ले दू पइत छपवा के दू अलग - अलग विचारधारा के राजनीतिक मुखिया मन के हाथ ले विमोचन करवाना हे।
- अच्छा एके ठन किताब ल दू अलग - अलग नांव म लिख - छपवा के विमोचन करवाना हे।
- हहो, तभे तो पता चलही तैं कतका बड़ युगपुरुष आस तेन ह। इहां किताब के स्तर अउ वोमा लिखे जिनीस के महत्व ल नइ देखे जाय। देखे सिरिफ अतके जाथे के के पइत किताब छपीस अउ कतका बड़े - बड़े मुखिया मन के हाथ ले वोकर विमोचन होइस।
- अच्छा, त पूरा युगपुरुष के बनत ले के पइत विमोचन करवाए ले लागही ?
- तभो ले बीस - पच्चीस पइत तो लागी जही बाबू।
- एके ठन किताब के गा ?
- त कइसे करबे, बीस - पच्चीस ठन किताब लिखे सकबे तैं ह ?
- हां, लिखे तो नइ सकंव गा।
- एकरे सेती काहत हौं, एके ठन किताब ल अलग - अलग नांव म छपवा।
- फेर मैं तो एके ठन किताब ल घलोक नइ लिख सकहूं, तइसे लागथे गा।
- त का होगे नइ लिख सकबे ते। अरे जकहा, दूसर मन कतेक अकन किताब लिख लिख के बिन छपवाय मरगे हवयं, वोमा के एकाद ठन ल भिड़ा ले। ओकर घर वाला मन से दू - चार पइसा देके बिसा ले, अउ तहां ले अपन नांव म छपवा ले। बड़े आदमी मन सब अइसनेच तो करथे रे बाबू। जतका इहां मंत्री - संत्री हे, सबो झन के इहीच हाल हे। जे मन ल बने गढ़न के दसकत करे ले नइ आवय, तेनो मंत्री मन के एक ले बढ़ के एक किताब देखे ल मिलथे।
- अच्छा, मंत्री मन घलोक अइसने करथें ग ?
- त फोकट म युगपुरुष बन जथे रे ? मंत्री बने भर ले कुछु नइ होवय, लेखक बने ले लागथे लेखक। तब जा के युगपुरुष के पदवी ल पहुंचाथें।
खोरकिंजरा मोर बात ल सुनके क_ल - क_ के हांसे लागीस। अउ तहांले नाचत - नाचत अपन घर कोती रेंग दिस। दू दिन पाछू फेर वोकर संग भेंट होइस, त बताइस के लेखक फुदरु परसाद के छोड़ के मरे किताब ल वोहर अपन नांव म छपवाए खातिर बिसा डरे हे। संग म दू डांढ़ के अपन खुद के कविता घलोक लिख डारे हे। वो ह नेता ऊपर आधारित अपन कविता ल घलो सुनाइस -
जइसन - जइसन घर - दुआर, तइसन होथे नेता।
जेकर मन के घर नइ राहय तइसनो होथे नेता।।
अब बपरा खोरकिंजरा परसाद ल दू डांढ़ खुद के लिखे कविता अउ किताब छपवाय खातिर बिसा के लाने रचना के बेवस्था करे ले मैं वोला युगपुरुष वाला लेखक के पदवी दे के जुबान तो देइच डारे रेहे हौं, तेकरे सेती अपन जुबान के लाचारी म फंसे वोला युगपुरुष लेखक के पदवी दे देव, कोनो मानय ते झन मानय।
  • पता - 41/ 191, डॉ. बघेल गली, संजय नगर, रायपुर [ छत्तीसगढ़ ]

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