इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

सोमवार, 24 जून 2013

जिम्‍मेदारी


  • भावसिंह हिरवानी 


उस दिन अचानक बैंक में हरीश मा.सा. से मुलाकात हो गई। बैंक के कर्मचारी किसी जरूरी काम से उलझ गए थे जिसकी वजह से मा.सा. को प्रतीक्षा करते बहुत देर हो गई थी। मेरे अभिवादन के बाद उन्होंने बड़ी तल्खी से कहा - अज्जु जानते हो। इन दोनों लड़कों को मैंने विद्यालय में पढ़ाया है। आज ये अफसर बनकर कुर्सी पर बैठे हैं और आज मैं इनकी मेहरबानी की बाट जोहता बहुत देर से खड़ा हूं। इनकी कृतध्नता तो देखो, मेरा सम्मान करना तो दूर, किस तरह मेरी उपेक्षा कर रहे हैं ?
मैंने सहमति से सिर हिलाते हुए कहा - सच कहते हैं मा.सा.। पता नहीं आज की पीढ़ी को क्या हो गया है ? अब उज्जैन महाविद्यालय की घटना को ही देख लीजिए न। छात्रों ने अपने ही प्राध्यापक को पीट - पीट कर मार डाला और वजह भी क्या थी - उन्होंने छात्र संघ का चुनाव स्थगित कर दिया था, बस।
- यही तो मैं कह रहा हूं। एक जमाना था जब गुरू को सारे देवताओं से श्रेष्ठï पद की प्रतिष्ठïा मिली हुई थी। लेकिन आज हमारी क्या स्थिति है, आप स्वयं अपनी आंखों से देख रहे हैं।
मैंने एक दीर्घ सांस लेकर कहा - लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है मा. सा.। जरा सोचिए, अपने बच्चों को विद्यालय क्यों भेजते हैं। इसीलिए न कि वे वहां से एक सभ्य, सुशिक्षित इंसान और योग्य नागरिक बनकर निकलेंगे और देश तथा समाज की सेवा करेंगे। लेकिन यह कैसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं आप लोग, जो आपका ही सम्मान नहीं करती। बच्चे को अच्छे संस्कार देने की जिम्मेदारी तो आप गुरूजनों की है न ?
मेरी बातें सुनकर हरीश मा. सा. एक क्षण के लिए निरूत्तर हो गए। तभी कैशियर अपनी सीट पर आकर बैठ गया और बोला - मा. सा. आईये। कम्प्यूटर की खराबी के कारण आप लोगों को अनावश्यक रूप से परेशान होना पड़ा।
हरीश मा. सा. झट से काउन्टर की ओर लपके, लेकिन उनका चेहरा अब भी खीझ से भरा हुआ था।
  • पता - कबीर प्रिंटिंग प्रेस, गुरूर, जिला - दुर्ग ( छग )

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