इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 12 जून 2013

तोर मया के


  • पीसीलाल यादव
तोर मया के दिया बारेंव मन में जब ले,
मोर जिनगी म उजियार, होगे गऊकी तब ले ।

मैं मया के आखर, तैं भाखा पिरित के,
अंतस ले झरे निसदिन, झिरिया रे गीत के ।

तोर पिरित के बिरवा, लगायेंव मन में जब ले,
मोर जिनगी म तिहार, होगे हे गऊगी तब ले ।

आ देख ले गोई तैं, मोर मन ल फरिया के,
तोर सुरता ल राखे हँव, मैंं हा घरिया के ।

तोर मया के चि नहा, धरेंव मन में जब ले,
मोर जिनगी के सिंगार, होगे हे गऊकी तब ले ।

पानी कस जुड़ अऊ, आगी कस तात रे,
पिरित करइया ह जानै, पिरित के बात रे ।

तोर गोठ ल मया के, गँठियायेंव मन में जब ले,
मोर जिनगी म बहार, होगे गऊकी तब ले ।
  • गंडई - पण्‍डरिया, जिला -राजनांदगांव (छ.ग.)
  •     मोबाइल - 94241 - 13122

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