इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शुक्रवार, 14 जून 2013

राम पियारी म दुरगा जागीस


( छत्तीसगढ़ी कहानी संग्रह )
रामपियारी म दुरगा जागीस रूपेन्द्र पटेल की तेरह छत्तीसगढ़ी कहानियों का संग्रह है. कहानियों में समाज में व्याप्‍त विभिन्‍न समस्याओं और कुप्रथाओं के विरूद्ध संघर्ष का चित्रण है.
भरम और मर्द में पुरूष प्रधान समाज में पुरूष के अंध अभियान का चित्रण है तो पीरा ले मया जनमथे में बांझत्व निवारण हेतु बैगाओं से मोहभंग की कथा का वणर्न है. नोनी में कन्या भू्रण हत्या में स्वयं महिलाओं की सहमति का विरोध एहा उमर में नामक कहानी में अधेड़ अवस्था में बेटा की चाहत में दूसरे विवाह का विरोध, उढ़रिया में बेमेल विवाह के कारण पत्नी का नौकर के साथ भाग जाना, बिहिनिया के भुलाय व संस्कार में बहू का आत्मचिंतन, मरजाद के खातिर में कुरूप अविवाहित बेटी द्वारा शिक्षा प्राप्‍त कर आत्मनिभर्र होने की कहानी, अगी में अदालती चक्‍कर में गाँव  में दलबंदी तथा अपन भुंइयां में पलाय न से मोहभंग की कहानी को चि त्रित किया गया है.
शीषर्क कहानी रामपियारी म दुरगा जागीस की कथानक बौद्धिक बहस की मांग करती है. शराबी पति के उत्पीड़नों से त्रस्त रामपियारी में दुर्गा का अवतरण होना और शराबी पति को थप्पड़ मारना, भारतीय  समाज में एक क्रांतिकारी घटना की शुरूआत है. कथानक काल्पनिक नहीं है.इक्‍कीसवीं सदी के भारतीय  समाज में यह कथा ही सही ऐसी घटनाएं घटित हो रही है.  पति का दर्जा परमेश्वर का हो और पत्नी दासी बनी रहे, पति का हर अत्याचार सहती रहे ऐसा लिंग आधारित सामाजिक असमानता आज के जागृत, संघषर्शील और पुरूष प्रधानता के बंधनों से मुक्‍त होने की प्रबल इच्छा प्रेरित नारी मन को स्वीकार्य नहीं. यह उनकी बेचैनी और छटपटाहट की अनुगूँज है. नारी समाज द्वारा सामाजिक समानता हेतु संघर्षों की शुरूआत है. यद्यपि पितृसत्तात्मक राजसुख उद्भिद्, छद्म, पौरूष अहंकार को राम पियारी में दुर्गा का यह अवतरण सहज स्वीकार्य नहीं होगा परन्तु यह इतिहास सिद्ध सत्य  है कि जहाँ - जहाँ आसुरी शक्तियों के समक्ष त्रिदेव की शक्तियां निबर्ल और निश्तेज हुई है, वहाँ - वहाँ नारियों में दुर्गा का अवतरण हुआ है.
संग्रहीत कहानियों का शिल्प लघुकथात्मक है. अपन भुइंया कहानी किसी लंबी कहानी का संक्षेप प्रतीत होती है. इसके बावजूद इन कहानियों में नैतिकता का संदेश अंतनीर्हित है. नव साक्षर साहित्य  के रूप में यह उपयोगी सिद्ध होगी.आंचलिक शब्‍दों को समेटे इस संग्रह की भाषा से छत्तीसगढ़ी शब्‍दकोश भी समृद्ध होगा.  
एक हाथ की ताली
(उपन्यास )समीक्षा
समीक्षक - डाँ. रजन वर्मा
एक हाथ की ताली डाँ. गणेश खरे का छठवां उपन्यास है. इसके पूर्व उन्होंने कांतिदूत, बालाजुर्न, जाजल्य देव कीर्ति जशपुर तथा दुलर्भ की खोज नामक उपन्यास लिखे हैं. इनमें से तीन ऐतिहासिक तथा शेष सामाजिक एवं आंचलिक समस्याओं पर आधारित हैं. आपके तीनों ऐतिहासिक उपन्यास छत्तीसगढ़ के वैभवशाली इतिहास से संबंधित हैं. प्रस्तुत उपन्यास राजनांदगांव में साक्षरता अभियान की सफलता एवं महिला स्वसहायता समूहों द्वारा अल्प बचत के रूप में 8 करोड़ से अधिक की धनराशि संग्रह कर बैकों में जमा करने की उपलब्‍िधयों एवं महिला सशक्तिकरण की क्रांति पर आधारित है. इस तरह आंचलिक होते हुए भी इस उपन्यास की घटनाओं का प्रभाव सम्पूर्ण भारत सहित फ्रांस, जमर्नी, जापान आदि देशों पर भी पड़ा है. विश्व बैंक ने भी इन उपलब्धियों को आश्चर्य की दृष्टि से देखा है और इन तथ्यो का परीक्षण कर उनकी सराहना भी की है.
इस उपन्यास की केन्द्रीय  पात्र फूलवती छोटे मोटे अनेक पुरस्कारों के साथ प्रादेशिक स्तर के एक लाख के मिनी माता पुरस्कार से सम्मानीत की गई है. इसके साथ ही उसे महामहिम उपराष्‍ट्रपति के कर कमलों से राष्‍ट्रीय स्तर का सेठ जमनालाल बजाज पुरस्कार से भी सम्मानीत किया गया है. ये घटनाएं शत प्रतिशत वास्तविक है, कल्पित नहीं.
दूसरी ओर इस जिले का साक्षारता अभियान प्रदेश में पूणर्त: सफल रहा और सन 21 की जनगणना के अनुसार इस जिले की साक्षारता की दर 77.58 रही जो इस राज्य  में तो सबसे अधिक है ही, सम्पूर्ण भारत की साक्षरता दर से अधिक है, इस उपलब्‍धता के लिए स्वयं भारत शासन ने इस जिले को सम्मानीत किया है. यह भी वास्तविक तथ्य  है.
ये सारी क्रांतियां कैसे हुई ? एक हाथ की ताली में इन्हीं सबका कलात्मक ढ़ंग से प्रस्तुतीकरण किया गया है. लेखक की मान्यता है कि साक्षरता अभियान का ही रूपान्तरण इस जिले में महिला सशक्तिकरण के रूप में दिखाई देता है.
इस उपन्यास के प्रकाशकीय में लिखा गया है लेखक स्वयं इस जिले के साक्षरता अभियान का एक केन्द्रीय पात्र रहा है अत: इस रचना में जो कुछ प्रस्तुत किया गया है उसकी स्वानुभूतियों पर आधारित होने के कारण सत्य का अंश है. उसके अनुसार इस जिले का साक्षरता अभियान एक ऐसा अश्वमेघ यज्ञ रहा है जिसमें यहां के छोटे बड़े सभी व्यक्तियों ने अपने सामर्थ्‍य के अनुसार आहुतियां अपिर्त की है. डाँ. खरे ने कलात्मक एवं नाटकीय  ढ़ंग से जिले की इन्हीं सब धड़कनों को वाणी प्रदान की है.
निस्संदेह इस कृति की रचना के लिए लेखक बधाई का पात्र है. अभी तक इस विषय  पर हिन्दी साहित्य  में एक भी कृति  प्रकाश में नहीं आई है अत: इस दृष्टि से भी इस रचना का महत्व बढ़ जाता है
  • प्रो. हिन्दी विभाग, दमोह (म.प्र.)

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