इस अंक में :

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शनिवार, 15 जून 2013

महानगर में मनसुखा


नूतन प्रसाद
मनसुखा गुमशुम और उदास बैठा था. एक ने कहा - '' तुम यहां क्‍यों झख मार रहे हो, जाओ अपने मित्र कृष्ण के पास.अरे, उनसे जो भी भेंट कर लेता है, वह मालामाल हो जाता है.सुदामा कृष्ण से क्‍या मिले उनके तो दिन ही फिर गये.वे भीख मांगकर खाते थे पर आज दानियों में शिरोमणि हो गये हैं. उनके पास जमीन है .मकान है.वे सरपंच बनकर राज कर रहे हैं राज.''
मनसुखा ने सुना तो उसने कृष्ण के पास जाने का कायर्क्रम ही बना लिया.वह प्रस्थान करने तैयार हुआ कि दामा और श्रीदामा आ गये.दामा ने कहा - '' यार, तुम बड़े भाग्य शाली हो.कृष्ण से पैर धुलवाओगे पर उन्हें ज्यादा मत रूलाना क्‍योंकि वे पानी छूते तक नहीं.सीधे आंसुओं से पांव धोते हैं.सुदामा उनके पास गये तो वे पानी परात को हाथ छुए नहिं नैनन के जल से पग धोये ।
श्रीदामा ने कहा - खाली हाथ क्‍यों जा रहे हो.चांवल रख लो.चांवल खाने के बाद कृष्ण तुम्हें सांसद नहीं तो विधायक तो बनायेंगे ही.लेकिन यार उच्‍चपद प्राप्‍त करने के बाद हमारा भी ध्यान रखना.''
मनसुखा ने चांवल ढ़ूंढ़ा पर कनकी भी नहीं मिली.आखिर उसने मिट्टी ही रख ली कि कृष्ण बचपने में मिट्टी बहुत खाते थे.उन्हें देश की मिट्टी से बहुत प्यार तो था.अब मनसुखा कृष्णं शरणम् गच्छामि का जाप करते गांव से चला.कृष्ण भक्ति में लीन होने के कारण वह रेल्वे स्टेशन कब पहुंचा, पता ही नहीं चला.यदि किसी ऐरे गैरे से मिलना होता तो पैर बीच रास्ते में ही जवाब दे जाते.घर लौटने की नौबत आ जाती पर यहां तो कृष्ण से मिलना था ! मनसुखा सोच रहा था कि गाड़ी रेल्वे टाइम यानि देर से आयेगी मगर नहीं वह आदमियों जानवरों जैसे धज्‍िजयां उड़ाते ठीक समय पर आकर खड़ी हो गई.उसे दस बजे आना था तो दस बजे ही आयी.केवल दिनांक में अंतर पड़ा - चार के बदले पांच  ? मनसुखा जल्द से जल्द गाड़ी  में सवार होना चाहता था इसलिए एक यात्री से पूछा कि तृतीय श्रेणी का डिब्‍बा किधर है ?''
यात्री हंसा - कहां तृतीय  श्रेणी.इस देश मे कोई गरीब भी है ! नहीं जानता क्‍या कि इस देश ने बड़ी उन्‍नति कर ली है.यहां के लोग मध्यम और उच्‍चवगीर्य ही है.तू भी धंस जा किसी डिब्‍बे में.
मनसुखा एक डिब्‍बे में धंस गया.भाग्यवश उस दिन अत्यधिक भीड़ थी अन्य दिनों की अपेक्षा.भीड़ न हो तो यात्री धक्‍कामुक्‍की , बाक्सिंग और फ्रीस्टाइल जैसे साहसिक अभियानों से वंचित हो जाये.मनसुखा बैठने के लिए सीट ढ़ूंढ़ने लगा.उसने देखा कि एक आदमी आराम से सोया है.मनसुखा ने कहा - यहां पैर रखने लायक जगह नहीं है और तुम चार आदमियों का स्थान हड़पे बैठे हो ! उठो, मुझे भी बैठना है !''
उस आदमी ने आंख मटकाते हुए कहा -क्‍यों नाराज होते हो भाई,सरकार के बर्थ कंट्रोल कायर्क्रम को सफल बनाने के लिए ही तो मैंने बर्थ कंट्रोल किया है....।''
मनसुखा ने सिर पीट लिया.वह मर भी जाता तो किसी का क्‍या जाता ! इतने में टी.टी.सी.आया.उसने टिकिट मांगी तो मनसुखा ने दिखा दी.टी.टी.सी.आगबबूला हो गया -बड़ा ईमानदार है न जो फट से टिकट दिखा दी.तेरे यहां झाड़ में पैसे फलते हैं तो मुझे भी दे देना था.बेकार पैसे बहा दिये.''
मनसुखा ने कहा - साब, आप जैसे ही लोग यह कहते हैं कि बेटिकट की टिकट जेल के लिए कट जाती है.''
टी.टी.सी ने कहा - अबे,तेरे जैसे भुख्‍खड़ को कौन मुफ़त की रोटी तुड़वायेगा ! और टिकट कटाने हमारे जैसे लोग कह ही नहीं सकते.हम तो कहते हैं कि दान दक्षिणा करो और बेटिकट देश भ्रमण करो.''
उस गाड़ी के अधिकांश यात्रा बेटिकट थे.वे मनसुखा की खिल्‍ली उड़ाने लगे कि अब तक गाड़ी की सवारी मनुष्य  करते थे पर अब उल्‍लू भी करने लगे हैं.वहां एक डाक्‍टर था.उसने कहा - हमारे टिकट कटाने का सवाल ही नहीं उठता.हम खुद इतने सक्षम हैं कि दूसरों को स्वर्ग भिजवाने की टिकट काटते हैं''
नेता ने कहा - टिकट लेकर क्‍या करना है, अभी हमें कौन सा चुनाव लड़ना है ?''
इसी तरह मनसुखा उपहास कराते राजधानी पहुंचा.वह ट्रेन से उतरा कि उसकी जेब का मुण्‍डन हो गया.वह किंकतर्व्य विमूढ़ खड़ा था कि एक आदमी ने कहा -प्यारे ,यह राजधानी है. बाहर से आने वालों का यहां ऐसा ही स्वागत होता है.अभी मुण्‍डन हुआ है आगे गात्र - मदर्न और अंतिम संस्कार की भी व्यवस्था है.''
मनसुखा ने कहा - लेकिन यह जेबकतरा तो बड़ा शरीफ दिख रहा था.मैंने तो सोचा था कि राजधानी की कानून व्यवस्था तगड़ी होगी पर यहां उल्टी गंगा बह रही है.''
आदमी ने कहा - इसी पर तो राजधानी को गर्व है.यहां साधु के वेश में दुराचारी, जनसेवक के रूप में लुटेरे के दशर्न होते हैं.और वास्तव में कानून व्यवस्था इतनी चुस्त दुरूस्त है कि पुलिस के आगे डांके पड़ते हैं.जबर्दस्त पहरे के बीच से संवेदनशील दस्तावेज गायब हो जाते हैं.''
मनसुखा की आंखें फैल गई - अरे बाप रे ! यह तो दीया तले अंधेरा हो गया.''
वह स्टेशन से बाहर निकला कि एक इंस्‍पेक्‍टर आया.उसने पूछा -क्‍या रखा है - गांजा,चरस, या सोने की बिस्किट ?''
मनसुखा ने कहा - मिटटी है. कृष्ण को भेंट करनी है.वे मेरे मित्र है न !''
इंस्‍पेक्‍टर गरजा - अबे, झूठ क्‍यों बोलता है.यहां जितने भी आते हैं सब कृष्ण के रिश्तेदार बन जाते हैं.मैं आज ही उनके बीस भतीजे, चालीस सालों से मिल चुका हूं.तेरे ही समान सुदामा नामक एक व्यक्ति आया था.वह अपने को कृष्ण का सहपाठी बताता था पर वह तो चांवल का तस्कर निकला.
इंस्पेक्‍टर के साथ एक आरक्षक भी था. उसने कहा - कृष्ण के साथी - संबंधी ही तो अवैधानिक कार्य करेंगे. दूसरे करेंगे तो मरेंगे नहीं !''
इंस्‍पेक्‍टर ने कहा - तू ठीक कहता है पर यह कृष्ण का मित्र कदापि नहीं लगता.''
आरक्षक ने कहा - तो इसे छोड़िए सर, बड़े मुर्गे की तलाश करें .''
मनसुखा आगे बढ़ा तो देखा कि कुछ गुण्‍डे लड़कियों को छेड़ रहे हैं. उनका दुपट्टा छीन रहे हैं.मनसुखा गुण्‍डों से निपटना चाहता था कि एक गुण्‍डे ने कहा - अपना रास्ता नापो, हमसे उलझोगे तो तुम्हारी हड्डी पसली एक कर देंगे.''
मनसुखा ने फटकार लगाई - तुम्हारी मां बहन नहीं है क्‍या जो दूसरों की इज्‍जत लूट रहे हो ?बीच  सड़क मे आवारागर्दी कर रहे हो ?''
गुण्‍डे ने कहा - है, क्‍यों नहीं पर दूसरों की इज्‍जत लूटने से अपनी प्रतिष्‍ठा बढ़ती है.हम कृष्ण भक्‍त है तो चीर हरण क्‍यों न करें ! कृष्ण की कई पत्नियां है तो क्‍या हम दो चार नहीं रख सकते .''
मनसुखा की आंखें आश्‍चर्य से फैल गई.उसने कहा - क्‍या बकते हो, कृष्ण तो योगीराज हैं.''
गुण्‍डे ने कहा - बेटे, तुम राजनीतिकों की बात जानते हो ? वे कहलाते हैं योगी पर होते हैं भोगी ! वे पहनते हैं सफेद कपड़े पर दिल काला होता है. दूसरों की गरीबी हटाने की बात करते हैं पर गरीबी हटती है उनकी.समझे......।''
मनसुखा आगे बढ़ा कि एक आदमी मिला.वह अंधाधुंध शराब पी रखी थी.वह फिल्मी गीत गा रहा था - मुझे पीने का शौक नहीं ,पीता हूं गम भुलाने को...। मनसुखा ने पूछा- तुम कौन हो, शराब क्‍यों पीते हो ?''
शराबी ने कहा - मैं दुखी इंसान हूं.दुख दूर करने के लिए शराब का सहारा लेता हूं.तुम भी चिंतित दिख रहें हो. थोड़ी पी लो. सब चिंता हवा हो जायेगी.''
मनसुखा ने कहा - मैं कोई नशा नहीं करता.''
मनसुखा ने कहा - कौन कहता है कि मादक द्रव्यों में गुण होते हैं- अरे, गांजे से दमा होता है.शराब फेफड़े को छलनी कर देती है.धुम्रपान से कैंसर होता है .... दरअसल तुम पूरी तरह नपुसंक हो चुके हो.अपने साथ दूसरों को भी गलत पाठ सिखा रहे हो.''
शराबी को बड़ा गुस्सा आया.वह मनसुखा को मारने दौड़ा पर स्वयं धड़ाम से गिर पड़ा.वह पीटने में असमर्थ रहा तो मनसुखा को गालियां बकने लगा.मनसुखा को कृष्ण से भेंट करने की जल्दी थी इसलिए वह आगे बढ़ा.कुछ देर में उसने अपने को कृष्ण के बंगले के सामने पाया.वहां उसने देखा कि कुछ लोग बन्दूकें लिए खड़े हैं.मनसुखा ने पूछा -तुम लोग कौन हो. बन्दूकें क्‍यों रखे हो ?''
बन्दूक धारियों ने कहा - हम लोग संतरी है.कृष्ण की सुरक्षा के लिए बंदूकें रखे हैं''
मनसुखा को हंसी आ गई. उसने कहा - बहुत खूब ! बन्दूकों से कृष्ण की रक्षा होगी ! जहर खाने से मनुष्य  दीघार्यु होगा.बम और प्रक्षेपस्‍त्रों से संसार का विकास होगा.यही तुम्हारा तर्क है न ?''
बन्दूकधारियों की आंखें क्रोध से लाल हो गई. पास में सब्‍जी काटने का चाकू होने पर क्रोध सातवें आसमान पर चढ़ जाता है तो संतरियों के पास बंदूकें थी.उनका क्रोघित होना स्वाभाविक था.उन्होंने डपटकर कहा - कौन है रे ,यहां आने का कारण ?''
मनसुखा ने अपना नाम बताया.कहा - मैं कृष्ण का मित्र हूं.मैं उनसे भेंट करने आया हूं. मुझे अंदर आने दो.''
अब संतरियों के हंसने की बारी थी.उन्होंने कहा - अबे, अपनी सूरत आइने में देखी है.कृष्ण के मित्र कारखाने के मालिक है और उद्योगपति होंगे  कि तेरे जैसे गंवार होंगे.और घुसने की बात करता है.हमारी अनुमति के बिना तू तो क्‍या हवा भी नहीं घुस सकती .''
मनसुखा ने कहा - तुममें से कोई कृष्ण की हत्या कर सकता है.विदेशी जासूस कहीं भी स्वतंत्रता पूवर्क घूम सकता है पर मुझ जैसे निहत्थे को अंदर जाने की मनाही है.अब मुझे विश्वास हो गया कि कृष्ण के शासन में कहीं कोई धांधली नहीं है.....।''
बहस जारी थी कि कृष्ण बाहर आये.मनसुखा प्रसन्‍नता से चिल्‍लाया - भाई साहब,भाई साहब....।''
कृष्ण ने एक निगाह मनसुखा की ओर देखा और बिना बात किये कार में बैठकर चले गये.मनसुखा स्तब्‍ध खड़ा था कि संतरियों ने कहा - शायद तुम्हें मालूम नहीं कि कृष्ण को भाषणबाजी और नारों से सख्त नफरत है.उनका विश्वास सिर्फ कार्य पर है.तुम पहली बार आये हो तो तुम्हें खिलाने मिठाई लाने गये हैं .तब तक एनीमा लेकर पेट साफ कर लो...।''
मनसुखा ने कहा -मैं स्वयं परेशान हूं और तुम जले पर नमक छिड़क रहे हो.समझ नहीं ... मित्र होकर भी कृष्ण ने बात क्‍यों नहीं की ?''
संतरियों ने कहा -क्‍या मित्र, मित्र का रट लगा रखा है ! तुम्हें मित्र चाहिए तो झोपड़ियों की ओर मरता क्‍यों नहीं ?''
मनसुखा वहां से निराश लौटा.थोड़ी देर बाद शाम हो गई.विद्युत के बल्ब जल उठे.सजे संवरे लोग बाजार घूमने निकल पड़े.एक व्यक्ति ने कहा - अहा, देखो तो राजधानी कितनी अच्छी जंच  रही है.उसकी रंगीनी बढ़ गई है.''
मनसुखा ने कहा - मैं यह भी देख रहा हूं -लोग कीड़े मकोड़े की तरह वाहन के नीचे दब कर मर रहे हैं.गरीब गंदी नालियां सूंघ रहे हैं क्‍योंकि शहर को खूबसूरत बनाने के नाम पर उनकी झोपड़ियां उजाड़ दी गई है.एक अरबपति है तो दूसरा भिखारी.एक पकवान को फेंक रहा है तो दूसरे की भूख से अतड़ियां ऐंठ रही है.वास्तव में राजधानी की शोभा न्यारी है.''
मनसुखा ने कहा - यही लौकी, भिण्‍डी, चौलाई वगैरह...।''
वेयारा समझ गया कि ग्राहक विदुर है.वह आप से तुम पर उतर आया - धत्त तेरे की ! इतने ऊंचे होटल में घास पात पूछ रहा है.अरे, कम से कम चाइनीज चिकन की मांग कर.पेग लेते कैबरे डांस देख.पर उसके लिए जेब गर्म होनी चाहिए.यहां के खर्च को नेता, अधिकारी अथार्त काली लक्ष्मी के स्वामी ही वहन कर सकते हैं. तू किसी टपरा छाप होटल में जाकर अपना प्राण बचा.''
मनसुखा खदेड़ दिया गया. आखिर वह एक साधारण होटल में खाना खाया.जमुहाई आने लगी तो फूटपाथ में लेट गया.वह खरार्टे लेना चाहता था लेकिन वाहनों और आदमियों की आवाजाही  के कारण नींद उसे दबोच  नहीं पा रही थी.ऐसे में ही आधी रात कट गई.उसने पास ही लेटे एक हमाल से पूछा - यहां के लोग कैसे हैं.वे सोते भी नहीं क्‍या ! देखो न, अभी तक लेफट - राइट कर रहे हैं ?''
हमाल ने कहा - तू राजधानी की माया क्‍या समझेगा. आखिर देहाती है न !''
मनसुखा ने कुछ जोर से कहा - मैं सिर्फ हल खींचने वाला बैल नहीं.तुम बताओ. मैं समझ लूंगा.''
हमाल ने कहा - नाराज क्‍यों होते हो.मैं ठीक ही कह रहा हूं कि यह तुम्हारा गांव नहीं कि लोग खाये पीये और चद्दर तान कर सो जायें.यह राजधानी है.सारा देश सोता है तो यहां के लोग जागते हैं.ये दिन में ही नहीं रात में भी काम करते हैं.''
- आखिर कौन सा काम करते हैं ये लोग ?''
- ये देश के हित में काम करते हैं.देखो, आलू से भरा एक ट्रक जा रहा है मगर नीचे में मादक पदार्थ भरे हैं. दो आदमी गुपचुप कर रहे हैं. वे प्राचीन मूतिर्यों को उड़ाने की योजना बना रहे हैं.एक आदमी कार से फरार्टे भर रहा है.उसके पास सोने बिस्कुटें हैं....।''
मनसुखा ने कहा - तब तो ये अवैधानिक कार्य हुए और करने वाले अपराधी...।''
हमाल ने कहा - नहीं , ये समाज के प्रतिष्ठित नागरिक हैं.कल ये बेईमानी , भ्रट्राचार के विरोध में भाषण देंगे... गरीबों को भोजन और कपड़े बांटेंगे.रोगियों को मु्फत में दवाइयां देंगे.''
मनसुखा का दीमाग चकरा गया.ऐसे ही जागते उसने रात काटी.प्रात: हुई तो उसने सोचा- कृष्ण के पास व्यस्त कायर्क्रम रहता है अत: देखकर भी बात नहीं कर सके .आज जरूर मिलने का समय  देंगे.आखिर मित्र है . मुझे उसके पास चलना चाहिए.वह कृष्ण के बंगले की ओर गया लेकिन मुलाकांत नहीं हो पाई.पता चला कि कृष्ण खाना खाने के तुरंत बाद अकाल पीड़ित क्षेत्र का अवलोकन करने गये हैं.मनसुखा वहां से लौटा.वह बाजार की ओर निकला तो देखा कि दूकानोंमें ताले लटक रहे हैं. लेन देन बंद हैं.उसने एक  व्यापारी से कहा -दूकान खोलो, सामान बेचो, रूपये कमाओ.''
व्यापारी ने कहा - चूल्हें में जाय कमाई.हम दूकान नहीं खोलेंगे. देखो, सरकार ने फिर नया टेक्‍स ठोंक दिया है.आखिर वह भार जनता पर पड़ेगा.हम नहीं चाहते कि जनता का शोषण हो.इसलिए हड़ताल कर रहे हैं.... हम तो मिलावट और  मंहगाई के भी विरोधी है.''
मनसुखा ने कहा - यद्यपि तुम्हारे ही सामने तुम्हारी प्रसंशा करना उचित नहीं  है पर वास्तव में तुम जन हितैषी हो.अगर व्यापारी जैसे दूसरे भी हो जाये तो देश का कायाकल्प ही हो जाये.''
मनसुखा ने अपनी राह पकड़ी.वह व्यापारियों की प्रतिष्‍ठा में अच्छी कविता सोचते चल रहा था कि रिक्‍शा से टकरा गया.रिक्‍शा चालक ने कहा - पैदल क्‍यों मर रहा है ?कहीं जाना है तो रिक्‍शा में बैठ जा.जो मन में आये किराया दे देना .''
मनसुखा ने खखुवाकर कहा - एक तो तूने मुझे लंगड़ा बना दिया ऊपर से चिढ़ा रहा है.व्यापारी भाइयों को देख - वे जनता की भलाई के लिए अपने लाभ का स्वाहा कर रहे हैं .तुम्हें भी उनका अनुकरण करना चाहिए पर तुम्हें तो यात्रियों को लूटने की पड़ी  है.''
रिक्‍शा चालक हंस पड़ा.बोला  - व्यापारी कब से जनसेवक हो गये है जो उनका पक्ष ले रहे हो.यदि ये मंहगाई मिलावट के विरोधी हैं तो ये दंद फंद जनता करती है.वास्तव में ये बड़े घाघ है.ये हड़ताल उसी दिन करते हैं जब इन्हें चांवल कंकड़, हल्दी में पीली मिट्टी, घी में पाम आइल मिलाना होता है.अगर ये नुकसान उठाते तो इनका धंधा लाखों से करोड़ों , करोड़ो से अरबों तक कैसे पहुंच जाता ! ये विष रस भरा कनक घट जैसे हैं''
मनसुखा सारी बातें समझ गया.उसने कहा- मैं भी कितना मूढ़ हूं.कृषकों श्रमिकों के बीच  रहने के बावजूद भ्रमित हूं.धरती माता की सेवा करते करते उनके कई दादा परदादा खप गये लेकिन उनकी स्‍िथति में कुछ तो सुधार नहीं आयी.''
अगले दिन दंगे हुए.कफर्यु लगा.महानगर में दंगे न हो कफर्यु न लगे तो वह महानगर नहीं जंगल हो गया.मनसुखा ने इसके संबंध मे पूछा तो एक आदमी ने बताया कि दुनियां में शान्‍ित शान्‍ित के  नारे लग रहें हैं तो शान्‍ित की स्थापना के लिए ही कर्फयू लगाया गया है.देखो - बाजार चुप , सड़के सूनी है.चिड़ियां की आवाज नहीं आ रही है .सुई पटक शांति है.''
इसी तरह मनसुखा कई दिनों परेशान रहा. आखिर एक दिन राजधानी खुली.काम धंधा प्रारंभ हुआ.मनसुखा पुन: कृष्ण से भेंट करने चला. इस बार कृष्ण ने उसे चकित कर दिया.कुशल राजनीतिज्ञ वही है जो लोगों को चमत्‍कृत कर दें. लोगों को मुसीबत में डाल दें फिर उबारने दौड़ जाये. आग लगा दें फिर बुझाने दौड़ जायें.दौड़ तो जायें पर समस्याओं का समाधान न करें.वरना आश्वासन देने का मौका हाथ से फुर्र हो जायेगा.मनसुखा को देखते ही कृष्ण ने कहा- आओ मित्र, आओ...कहो गांव देहात का क्‍या हाल है ? कुशल मंगल है न ?''
मनसुखा ने कहा - हां , मगर सरकारी दस्तावेजों में. पानी के बिना खेत सूखे हैं.अन्‍न के बिना लोग भूखें हैं.... जिस वन में आप गाय चराने जाते थे उस वन का विनाश हो चुका है.मकान बनाने के लिए बांस बल्लियां कहां से पाएं ! कितने बताऊं - लोगों का दुख दर्द सुनने वाला कोई नहीं है.''
कृष्ण मंद - मंद मुस्कराने लगे. मनसुखा को आश्‍चर्य हो रहा था. मनसुखा के सामने समस्याओं का अंबार था और कृष्ण के ओठों पर रहस्य मयी मुस्कान. मनसुखा चुप हो गया. वह चाह कर भी कुछ नहीं कह सका....।
ग्राम - भण्‍डारपुर ( करेला ), पोष्‍ट - ढारा, व्‍हाया - डोंगरगढ़, जिला - राजनांदगांव(छ.ग.)

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