इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

सोमवार, 10 जून 2013

गुलाब लच्‍छी, छत्‍तीसगढ़ दरसन



  • समीक्षक - कुबेर 
साहित्य  अकादमी नई दिल्‍ली भाषा - सम्मान प्राप्‍त डां. मंगत रवीन्द्र छत्तीसगढ़ी भाषा के अनन्य  साधक व अग्रग·य  लेखक हैं. गुलाब लच्छी उनकी छत्तीसगढ़ी भाषा में लिखी उन्‍नीस कहानियों का सद्यप्रकाशित संग्रह है. संग्रहीत कहानियों में छत्तीसगढ़ी लोकजीवन के विविध पक्षों यथा - रीति रिवाज, रहन - सहन, लोकाचारों, संस्कारों आदि का यथार्थ चित्रण किया गया है. संग्रह के जरिये पाठकों को इन सब की सम्य क जानकारी मिले यह अच्छी बात है, परन्तु कुछ रचनाएं परंपराएं जो अब लोक व्यवहार और लोकाचार से लगभग तिरस्कृत हो गई है. जैसे - विधवा भाभी को चूड़ी पहनाकर पत्नी बनाना (सोनहा दीया), को कहानी का विषय वस्तु बनाकर व महिमा मंडित कर, पाठकों को परोसना अपने औचित्य  पर प्रश्न चिन्ह लगाता है.
छत्तीसगढ़ में रहने वाले अधिकांश गैर छत्तीसगढ़िया भी य हां की लोक परंपराओं और रीति - रिवाजें से परिचित है. और वैसे भी इन तत्वों को विषय वस्तु बनाकर अनेक कहानियाँ लिखी जा चुकी है. इनसे छत्तीसगढ़ी कथा साहित्य  में संख्यात्मक वृद्धि तो होती है, परन्तु गुणात्मक समृद्धि के लिए वतर्मान की ज्वलंत समस्याओं यथा किसानों, गरीबों और मजदूरों की दयनीय  आथिर्क स्‍िथति, युवकों में बेरोजगारी और छत्तीसगढ़ के विपुल प्राकृतिक संसाधनों - संपदाओं का गैर छत्तीसगढ़ियों द्वारा बेतहाशा शोषण, परन्तु छत्तीसगढ़ियों की हीनता जन्य  तटस्थता, निराशाजनक व शमर्नाक चुप्पी आदि अनेक ज्वलंत समस्याएं है जिन पर कलम चलाने की महती आवश्यकता है. इसके बिना न तो छत्तीसगढ़ी लेखकों की लेखकीय  दायित्वों का निवर्हन संभव है और न ही समकालीन छत्तीसगढ़ी कथा साहित्य  का विकास ही.
' रमाएन' कहानी में छुआछूत की समस्या तथा ' गरीबी रेखा ' में व्यवस्था पर की गई चोट सराहनीय  अवश्य  है परन्तु पर्याप्‍त नहीं है क्‍योंकि संग्रह में समग्र रूप से इस तरह की कोई विचारधारा बनता प्रतीत नहीं होता.
छत्तीसगढ़ की लोक कथाओं और लोक गीतों में समाज के अंदर नारी की हीन दशा की मामिर्क अभिव्‍यक्ति होती आई है. इसी परंपरा का पोषण करते हुए संग्रह की लगभग आधी कहानियों में छत्तीसगढ़ी लोक समाज में नारी की विभिन्‍न परिस्थितियों की पड़ताल की गई है. जिस संघर्ष में पुरूष असफल व पराजित हो जाता है, वहाँ भी नारी अपनी अदम्य  साहस व अखंडित जीवनीय  शक्ति के बल पर स्वयं की, अपने परिवार की और सामाजिक मयार्दाओं की रक्षा करनें में सफल हो जाती है. ऐसे उदाहरणों की भारतीय  परंपरा में कमी नहीं है. संग्रह की कहानियों में ' जनम कुआरी' की सुनैती, दौना की च मेली, दुनों फारी घुनहा की लुच की, आंसू की गुरबारा, न रांडी न एहवाती की मुंगिया तथा शिक्षाकर्मी - तीन की कदेला ऐसे ही नारी पात्र हैं परन्तु आदर्शों का पालन करते हुए भी इनमें से कोई भी नारी पात्र कारी के समान कालजयी नहीं हो पाई है. ये सभी पात्र परंपराओं और रूढ़ियों से संघर्ष करतीं तो प्रतीत होती हैं परन्तु विद्रोह करती प्रतीत नहीं होती. यह कहानी के इन पात्रों की असफलता न होकर लेखक की सपाटबयानी और अतय थाथर्वादी चरित्र चित्रण को वरीयता देने के कारण हुआ प्रतीत होता है. कल्पनाशीलता और भवाथर्परक आदशर्वादी दृष्टिकोण भी कहानी के लिए आवश्य क तत्व होना चाहिए. इसके अभाव में कहानी और सत्यकथा में अंतर कर पाना कठिन हो जाता है. ' भरका ' कहानी में इसी कठिनाई का अनुभव होता है.
छत्तीसगढ़ी में कहानी कहने की लोक शैली में लोकगाथा गायन की शैली का असर कुछ अंशों में यत्र - तत्र पाया जाता है. इस संग्रह में लेखक इसी शैली से प्रभावित प्रतीत होता है. कहानियों के बीच  - बीच  में प्रयुक्‍त शेर, नीतिपरक दोहे और कविताएँ शैली को मनोरंजक अवश्य  बनाती हैं परन्तु ये लोकगीतों अथवा लोक गाथाओं का स्थान ले पाने में समक्ष हो जाये, ऐसा कैसे संभव हो सकता है ?
छत्तीसगढ़ी भाषा के लिखित स्वरूप में अभी एकरूपता नहीं आ पाई है. बस्तर से लेकर रायगढ़ तक विभिन्‍न अंचलों में बोली जाने वाली छत्तीसगढ़ी भाषा के स्वरूप में पर्याप्‍त अंतर है, जिसका असर लेखक में होता है. लिखित स्वरूप में एकरूपता विकसित हो ऐसा प्रयास प्रत्येक लेखक को करना चाहिए. संग्रह की भाषा कथानक की आवश्य कता अनुसार लोक की ही भाषा है. हानों के सामयिक प्रयोग से भाषा में प्रवाह व प्रेषणीयता है परन्तु रखपोंदवा जैसे शब्‍दों के प्रयोग से परहेज भी जरूरी है.
दरसन
  • समीक्षक - एल.पी. मिरी
(छत्तीसगढ़ी काव्य  संग्रह )
छत्तीसगढ़ दरसन हरप्रसाद ' निडर ' का तृतीय  काव्य  संग्रह है. कुण्‍डलियाँ, गीत,गज़ल एवं हाइकु जैसे विभिन्‍न काव्य  लेखन शिल्पों में बहुरंगी रचनाओं के माध्यम से आपने अपनी भावाभिव्यक्तियों को रूपायित किया है. संवेदन शील कवि होने के नाते आप में समाज एवं राष्‍ट्र के प्रति लोकोन्मुखी चेतना है. छत्तीसगढ़ी काव्य  संग्रह में छत्तीसगढ़ की संस्कृति, खानपान, त्योहार, कृषि, फल - फूल, गांवों की श्रमसाध्य  जीवन एवं विसंगतियों का अनुभूतिमूलक चित्रण है. संग्रह को पढ़ने से छत्तीसगढ़ के प्रति आस्थामय  रसमय ता का बोध कवि के उद्गारों से स्पष्‍ट झलकता है. कविता कैसे बनती है, एक बानगी देखिए -
अंतस म पीरा डबक डबक के,
हे आँसू बन भर जाथे .
सुरुंग फोर के तभे जिगर ले,
कागद म कबिता ढ़र जाथे .
हरधर किसान जब बोआई कार्य संपन्‍न करने के लिए खेत जाने लगता है, उस समय  अपनी बहू को जो निर्देश देता है, उसकी अभिव्यक्ति में कवि की अनुभूति पठनीय  है -
डेच की म बासी - पेज धरले बहू गेंदा.
पानी ल भरले बने लोटा बिना पेंदा.
नून आचार अऊ मिर्चा चटनी के धरले लेंदा.
रोटी ल भूलाबे झन अँगाकर पिसनहा.
लउहा - लउहा उठा बूता काम म किसनहा.
ग्रामीण पयार्वरण निश्छलता सादगी एवं श्रम के प्रति समपर्ण को कवि ने शहरी जीवन की अपेक्षा अधिक श्रेष्‍ठ मानते हुए लिखा है -
गाँव के चिखला कोंवर - कोंवर
सड़क शहर के गड़थे .
शहरी जाँगर अर पोटा,
गाँव के हाड़ा लड़थे .
कवि की युगीन चेतना गांव से शहर एवं समाज तक विस्तृत है. भरगे पानी सरगे बीज, गाँव गली म माते चि खला, बैरी झन तैहर देहे घेंच ल रेत, अ रहा गरीबी जाँगर होगे मैं अचेत, सूर भर लंबा सलबल सैया रेंगथे असढ़िया, ओरमें करेला कुंदरू हांसै, पावडर चुपरत हावै रखिया, झूलवा झूले लौकी जइसे नवा गवन के डौकी, एक डहर फुंकारत नागिन बेनी गाथत हे ढ़ेखरा, जैसे शबद संयोजन अनुकरणीय  एवं पठनीय  है.
पुलिस प्रशासन के भ्रष्‍ट आचरण पर कवि के उद्गार की एक झलक से सब कुछ स्पष्‍ट हो जाता है -
गिधवा बनगे थानेदार, कौवा बने सिपाही.
थाना झन जइहा भइया, चीथ - चीथ के खाही.जीवरा नइ तो बाँचै ग.
धान म माहों कस दाना नइ तो बाँचै ग.
छत्तीसगढ़ दरसन शीषर्क रचना में केवल बारह साथर्क कुण्‍डलियों के माध्यम से छत्तीसगढ़ की विशेषताओं का दशर्न हो जाता है. पुस्तक पठनीय , सरल, सशक्‍त है.

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