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शनिवार, 22 जून 2013

परिन्दों का अंतर्ज्ञान

  • विजय प्रताप सिंह 
जब होने को होती है
प्राकृतिक दुर्घटना
आने को होता है
भूचाल,
भूस्खलन सैलाब
तूफान आँधी तो
न जाने ये परिन्दे
इसकी सूचना
प्राप्त करने लगते हैं।
इन्हें होने लगता है
पूर्वाभास किसी भी तरह की
देवीय आपदा का
उसके आक्रोश का,
संकट का
वे फड़फड़ाने लगते हैं।
जोर - जोर से
चिल्लाने लगते हैं
इनके स्वर बदलने लगते हैं
कठों से अजीब भय सी
बोली निकलने लगती है
धरती के आदिम लोग
जो
इन स्वरों की भाषा
पढ़ पाते हैं
आने वाली आपदाओं को
इन परिन्दे से
मिलते संकेतों से
जो
लोग इस छोर से
उस छोर तक
व्याप्त होते रहते हैं
बेतार के तार की तरह
समाचार फैलाते हैं
पृथ्वी के
उन कक्षों में
जहॉ पक्षियों की
आवाज से
हवा फैलाने लगती है
तरंगे
जो
आसानी से संकेत देती है
आदिम युग से
अब तक
पक्षियों का अंतर्ज्ञान
नहीं बदला है
न मंद हुआ है,
न बंद हुआ है
हुआ है तो
हम मनुष्यों का
ज्ञान जो इन
संकेतो को
अब नहीं पढ़ पाते है
पर परिन्दे रोते हैं
चीखते - चिल्लाते हैं
सबको पहले से
विनाश के पूर्व आगमन की
सूचना देते हैं
आगह करते हैं।
पता - पंचशील वार्ड, क्‍लबपारा, महासमुन्‍द (छ.ग.)

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