इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

गुरुवार, 27 जून 2013

चायवाली अम्मा



-  नरेश श्रीवास्तव   -

ऍल्यूमिनियम की वह केतली भले ही काली हो चुकी थी पर उसमें से चाय बिलकुल अपने शाश्वत रुप से निकलती। चाय वाली अम्मा पिछले कई वर्षों से उस गुमटी में चाय की दुकान चलाती है। कई बरसाती बौछारों से गुजर जाने के बाद उनकी गुमटी आज भी यथावत है, जैसे मील का पत्थर।
अम्मा के ग्राहकों में सभी वर्गों के लोग है। अम्मा की दुकान के सामने उत्तर की  ओर रक्षित पुलिस लाईन का कार्यालय है। कार्यालय और अम्मा की गुमटी के बीच से होकर पूर्व से पश्चिम  की ओर एक राष्ट्रीय राजमार्ग शहर के मौन को चीरता हुआ निकलता है। कार्यालय की ओर से चाय पीने वाले ग्राहकों को अम्मा की गुमटी तक पहुंचने  में इधर  - उधर नजर दौड़ानी पड़ती है। क्योंकि राष्ट्रीय राजमार्ग पर पिछले कुछ वर्षों से ट्रेफिक का प्रतिशत कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है, जिसके कारण आस - पास ध्वनि प्रदूषण भी कई - कई डेसीबल बढ़ गया है। इतने ध्वनि प्रदूषण के बावजूद अम्मा के ग्राहक उनकी दुकान में चाय की चुस्कियों की बीच बतिया लेते हैं। राजमार्ग की हालत वैसी ही है जैसी अन्य शहरों की।
अम्मा की गुमटी के पीछे दक्षिण की ओर एक रिहायशी कालोनी है। कालोनी में है सभी वर्ग के लोग। सभी भाषा के लोग। सभी मौजूदा हालात के लोग, अम्मा की गुमटी के दोनों ओर और भी कई दुकान, नाई की दुकान, धोबी की दुकान, रिपेरिंग की दुकान जैसी और भी कई दुकानें हैं। याने अम्मा की चाय की दुकान वो सारे तत्व अपने आस - पास समेटे हुए थी जो चाय के ग्राहकों के लिए उनकी चाय की चुस्कियों के बीच आनंद लेने के लिए जरुरी होती थी।
रक्षित पुलिस लाईन के सिपाही जब अम्मा के पास चाय पीने पहुंचते तब अम्मा धीरे से सुबह का अखबार उनके सामने सरका देती। सुबह का अखबार हमारे शहर का एक ऐसा दैनिक अखबार है जिसके बिना चाय का स्वाद फीका पड़ जाता है। मुसीबत तब होती है जब उस एक अखबार को पढ़ने वाले ग्राहक अनेक होते हैं। पर यह मुसीबत दूर हो जाती है जब पढ़ने वाला उस अखबार में छपी खबरों को चटखारें ले लेकर पढ़ता, तब सुनने वाले उन खबरों को चाय की चुस्कियां लेते - लेते सुनते। मेरी इस कहानी में कोई नया दृश्य नहीं है। ऐसा दृश्य तो हर शहर, हर मोहल्ले में देखने को मिल सकता है। सबसे अलग बात सिर्फ इतनी है कि यह चाय वाली अम्मा की दुकान है।
इस तरह शुरु होती अम्मा की चाय की दुकान की ग्राहकी। ग्राहकों को अम्मा का नाम तो मालूम  है पर अम्मा कहां से आई, ये किसी को नहीं मालूम। अम्मा यहां कब से चाय की दुकान चला रही है, ये भी किसी को नही मालूम। मालूम है तो सिर्फ इतना कि अम्मा के हाथों से बनी चाय पीने के लिए दूर - दूर से लोग उनकी गुमटी में पहुंचते हैं।
अम्मा सुबह सबेरे चाय की दुकान खोल देती और शाम होते - होते दुकान समेटने लगती। अम्मा को लोग मिसेज रोजलीन के नाम से जानते थे पर उनका नाम लोगों की जुबां पे नहीं होता। लोग मिसेज रोजलीन को चाय वाली अम्मा ही पुकारते।
एक दिन की बात है। मिसेज रोजलीन याने कि अम्मा, चाय की दुकान में ग्राहकों का इंतजार कर रही थीं तभी कुछ स्कूली बच्चे वहां पहुंचे। बच्चे आजकल के थे इसलिए उनमें से एक बेसाख्ता बोला - आंटी चाय। इतना सुनना था कि अम्मा का माथा चाय की केतली की तरह एकदम गर्म हो गया। वह उस बच्चे से बोली - ऐ बाबा, इहां के अख्खा लोग अमको अम्मा पुकारता। तुम भी अमको अम्माइच पुकारना। अमारा नाम नई बिगाड़ने का। समझा तुम सब लोग। तुम सब अंग्रेजी मीडियम का छोकरा का माफिक लगता, इसीलिए आंटी पुकारता। मालूम आंटी सुनने मे अच्छा नई लगता। तुम आंटी पुकारता। सुनने में एंटी लगता और एंटी का मतलब समझता तुम सब लोग ? तुम लोगों के छोटा - छोटा दिमाग में इतना बड़ा - बड़ा बात आयेगा कि नई अम नई जनता, पन अम इतना तो जनताइच कि एंटी का माने दुश्मनी, लड़ाई - मारकाट। इसलिए इस माफिक अमको आंटी नई पुकारने का। अम्माइच पुकारने का समझा, तुम सब लोग। अम्मा बोले तो प्यार मिलता। अम्मा में प्रभु का नाम मिलता। अम्मा में बोले तो क्या नई मिलता ? अम्मा अम्माइच है और आंटी एंटी इसलिए अमको अम्माइच पुकारने का। समझा तुम सब लोग।
बच्चे पहले पहले अम्मा का वह तेवर देख एकाएक सहम गये। लेकिन बाद में अम्मा को शांत पाकर वे सब भी सामान्य हो आपस में फुसफुसाने लगे। वे सब समझ गये थे कि चाय वाली अम्मा को अम्मा पुकारने है, आंटी नहीं। इसी बीच उन बच्चों में से कोई बोला था - अम्मा चाय।
- हां, अभी कैसा राइट पुकारा। अम्मा बोली - पन अम तुम सब लोगों को चाय नहीं देगा। तुम बच्चा लोगों को अपना छोटा दीमाग में अभी बड़ा - बड़ा बात रखने का। इस वास्ते न तो तुमको चाय पीना मांगता अउर न तो काफी। समझा तुम सब लोग अगर पीनाइच मांगता तो दूध पीने को देगा। अम तुम सबका वास्ते दूधा बनायेगा। बोलो मंजूर ?
बच्चे सोचने लगे। तभी अम्मा बोली - अरे क्या सोचता तुम सब लोग। दूध क्या पहली बार पीने को मिलता। अम तुम सब लोगों को असली प्योर दूध देगा। अमारा इहां गांव से दूध आता। एकदम नेचुरल। अउर पैइसा, बिलकुल कमती लेने का चाय का माफिक। समझा तुम सब लोग ? अब तुम्हारा मर्जी, तुमको क्या पीने का। अमारा ड्यूटी था तुम सबको ताकिद करना इस वास्ते ताकिद किया। अभी जल्दी बोलो चाय पीने का या दूध ?
दूध सभी बच्चे एक साथ बोल पड़े। इस बीच एक बच्चा अपने दूसरे साथियों के बीच फुसफुसाते हुए कह रहा था - ये अम्मा हम सभी को बार - बार समझा तुम सब लोग। क्यो बोलती है ? शायद अम्मा ने उसे फुसफुसाते हुए देख लिया था। इसलिए वह बोली थी - ये छोकरा तुम उधर क्या फुस - फुस करता। ट्रेफिक का इतना शोर में जोर से बोलने का अम्मा का तकियाकलाम फिर दोहराती उससे पहले सभी बच्चे एक साथ बोल पड़े - समझा तुम सब लोग। तब अम्मा हंसते हुए बोली - अच्छा अपुन के साथ मसखरी करता। अमारा नकल करता। कोई बात नई तुम बच्चा लोगों के वास्ते इतना तो चलेगाइच समझा तुम सब लोग। बच्चे फिर जोर से हंस पड़े अम्मा भी मुस्करा दी। बच्चे दूध पीकर जाने लगे, अम्मा तब बोली थी - तुम सब लोग रोज आना अउर ये चायवाली अम्मा तुम सबको रोज दूध पिलायेगा। सभी बच्चे - समझा तुम सब लोग । कहते हुए वहां से चल पड़े। अम्मा फिर मुस्कुरा दी।
अम्मा आज सुबह सबेरे नये कपड़े में थी। कुछ सिपाही अम्मा की गुमटी में पहुंच चुके थे। हमेशा की तरह कोई एक अखबार पढ़कर सुनाना शुरु किया - महिला बिल को लेकर संसद में मारपीट की नौबत ... आज क्रिसमस डे।
अम्मा तब कांच गिलासों में उनके लिए केतली के चाय उंडेल रही थी। वह बोली - तुम सारा का सारा सिपाही इहां से वुहां मारपीट रोकने का काम करता। फिर उधर संसद में तुम्हारा बिरादरी का लोग मारपीट क्यों नई रोकने को सकता। आज जीजस का बर्थ डे। बर्थ डे बोले तो - बड़ा दिन। बड़ा दिन माने प्यार का दिन। मोहब्बत का दिन। ऐसे दिन को अबी तुम बोलो अम क्या मारपीट के संग मनायेगा ? अम भी लेडिज। अम भी तो किसी के पास कुछ मांगने को नई जाता। संसद में जो अमारा नाम के बहाने लड़ता वो हमारा बहाने अपना - अपना कुर्सी का वास्ते लड़ता हमारा बिरादरी के लोगों को समझने को मांगता। अम कमजोर नई। अम सब कुछ करने को सकता। अभी मेरे कोइच देखो - मे चाय की दुकान चलाता। खुदइच अपनी मुश्किलों से लड़ता। में भी तो लेडी क्या हुआ अमको ? कुछ हुआ ? बिगनिंग में कुछ लोगों ने बोला - औरत हो के चाय का दुकान चलाता है। तब अपुन चुप नई बइठा अपुन भी बोला - क्यों इसमें क्या मिस्टेक ? तुमको तुम्हारा घर में चाय कौन बना के पिलाता ? आयं ? तुम्हारा अम्मा, तुम्हारा जोरु या तुम्हारा सिस्टर। वो सब भी तो लेडी ? फिर में चाय बनाकर क्यूं नई पिलाने सकता ? अरे चाय को गोली मारो ? अब साइकिल तो दूर अमारा बिरादरी का लोग ट्रक, ट्रेन यहां तक प्लेन चलाता सरकार चलाता फिर अपुन चाय की दुकान क्यों नई चलाना सकता ? लेडीज को इतना कमजोर क्यों समझने का ? उसे खुद अपना अधिकार जानने का ? अपना मंजिल पाने का ?
आज रात हम जीजस से पूछेगा - दुनियामें लड़का - लड़की, बेटा बेटी, आदमी औरत के बीच इतना डिफेरंस क्यों ? ये डिफ्रेंस कब मिटेगा। अम प्रे करेगा कि अमारा चाय का दुकान में स्कूल का जो बच्चा लोग दूध पीने के वास्ते आता उनका छोटा - छोटा दीमाग को बिलकुल प्योर रखना क्योंकि अम उन बच्चों को प्योर दूध पिलाता। बिलकुल अम्मा के माफिक। सिपाही अम्मा का स्वभाव जानते थे, इसलिए उसे चुपचाप सुनत रहे। चाय की चुस्कियों में अम्मा की बातें घुलती जा रही थी। चाय पीकर सिपाही वहां से निकल पड़े।
इधर अम्मा आज शाम होने से कुछ पहले ही दुकान समेटने लगी। उसे आज रात चर्च जाना है। वह चर्च में प्रेअर करेगी। बहुत संभव है उसके प्रेअर का असर हो। उस रात में जो सिपाही अपनी ड्यूटी में तैनात है वह भी अम्मा के विषय में सोच रहा है। उधर चर्च का घंटा बजता है, इधर रक्षित पुलिस लाइन में बारह का घंटा बजता है। घंटों की आवाज रात के सन्नाटे को बेधती हुई मानो ट्रेफिक का पीछा कर रही थी। उस सिपाही ने अपनी ड्यूटी के बीच उस सर्द रात में एक बीड़ी सुलगाई। अंधेरे में धुआँ छोड़ते हुए सिर्फ इतना बुदबुदाया - हे जीजस, अम्मा का ध्यान रखना ताकि हम सब उनके हाथों की बनी चाय सुकून से पी सके। यही हमारे जैसे आम आदमी की सबसे बड़ी जरुरत है और यही सबसे बड़ा उपकार ....।
फे्रंस कब मिटेगा ? अम प्रे करेगा कि अमारा चाय का दुकान में स्कूल का जो बच्चा लोग दूध पीने के वास्ते आता उनका छोटा - छोटा दीमाग को बिलकुल प्योर रखना क्योंकि अम उन बच्चों को प्योर दूध पिलाता। बिलकुल अम्मा के माफिक। सिपाही अम्मा का स्वभाव जानते थे, इसलिए उसे चुपचाप सुनत रहे। चाय की चुस्कियों में अम्मा की बातें घुलती जा रही थी। चाय पीकर सिपाही वहां से निकल पड़े।
  • पता - कमला कालेज रोड, राजनांदगांव (छ. ग .) मो. 98278-77573

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