इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

बुधवार, 26 जून 2013

अफसर



  • - डॉ. महेन्द्र कुमार ठाकुर -

वह पूरा अफसर था। एकदम कड़क। रौबदार। उसकी आवाज में ही नहीं, चाल और हाव - भाव में भी अफसरी थी। उसका हर अंदाज एक अफसर का था।
उसे अपनी कार में चढ़ना होता तो एक चमचा दरवाजा खोलता - आइए सर, बैठिए।
वह जहाँ पहुंचता एक चमचा कार का दरवाजा खोलता - नमस्कार सर, आइए।
उसे हस्ताक्षर करना होता तो एक चमचा पेन खोलकर उनके हाथों में देता - सर लीजिए। एक चमचा फाइलें खोल कर दिखलाता सर यहाँ करने है हस्ताक्षर।
उसके हस्ताक्षर होते ही एक चमचा फाइलें वहाँ से हटाता जाता।
उसे सिगरेट पीनी हो तो एक चमचा पैकेट खोलकर उसके सामने कर देता - सर यह रही सिगरेट। आपकी पसंदीदा मार्का की है।
दूसरा चमचा लाइटर जलाकर उनके मुँह के पास कर देता। वे उसकी लाइटर से मुँह में रखे ही सिगरेट जलाते।
मध्यान्ह, कार्यालय में फोन की घंटी बजी। उसके पी. ए. ने रिसीव्हर उठाया। सर दिल्लीसे छोटे भाई साहब का फोन है। लीजिए।
- हाँ हलो,
- भइया, माँ का देहांत हो गया है।
- ठीक है .. डेड बाडी यहाँ भिजवाने की व्यवस्था करो। कार्यक्रम यहीं होगा। मेरे पास वहाँ आने का वक्त नहीं है। अफसर ने कहा।
श्मसान घाट का दृश्य। अफसरी अपनी पूरी शान में है। चिता के चारों ओर फेरे लग रहे हैं। जलती लकड़ी लेकर उसका सबसे खास चमचा उसके थोड़ा पीछे रहकर फेरे लगा रहा है। वे मायूस और गंभीर मुद्रा में अपनी माँ की मृत देह की परिक्रमा कर रहे हैं। उदास हैं। दुखी हैं। आँसू आँख तक आ नहीं सकते।
परिक्रमा पूरी हो चुकी है। पंडित की आवाज - अब चिता को अग्नि दे दें। चमचे ने जलती लकड़ी उसके हाथों में दे दी।
- लीजिए सर।
चमचे ने ही उसके हाथों का सहारा देकर जलती लकड़ी का जलता हिस्सा माँ के मुख तक पहुँचाया।
चिता में लपटें फैल रही थीं। चिता को अग्नि देकर उसे उन्होंने पुन: चमचे के हाथों में दे दी थी।
माँ की मृत देह अग्नि को समर्पित हो चुकी थी। उसका अफसरी अंदाज शान से अब भी मौजूद था। उसकी आँखों में आँसू नहीं आ सकते थे। वे अफसर थे। हाँ, उनके अधीनस्थ जरुर फूट - फूट कर रो रहे थे।
  • गीतांजली नगर, रायपुर (छ.ग.)
चिंगारियां

- मुहम्मद बशीर मालेरकोटलवी -

वह टकटकी बांधे, मुस्कुराती हुई नजरों से मेरी ओर खामोशी से देखता रहा और अपने खास अंदाज में इधर - उधर हिलता भी रहा। कोई जवाब न पाकर मेरा हौसला बढ़ा। मैं फिर बरसा - दरअसल, तुम लोगों को आराम की खाने की आदत पड़ गयी है। सौ - पचास मांग लिया और नशा कर लिया। बस मांगों और खाओ ... करके खाना बहुत मुश्किल है।
मेरी बात खत्म हुई तो वह कुछ संजीदा हो गया और आर्शीर्वाद देने के अंदाज में हाथ उठाकर बुलन्द आवाज में बोला - बस बोल लिए जितना बोलना था ...। थूक निगल कर और आँखें झपका कर वह तकरीबन चिल्ला उठा - सेठ, अगर मेरा काम इतना ही आसान समझता है तो आ बाहर निकल और भगवान के नाम पर दो रुपया मांग कर दिखा ....।
राजकीय पंजाब वक्फ बोर्ड, अधिकारी दिल्ली गेट,
समीप - एम पी स्कूल, मालेरकोटला, पंजाब - 148023

प्रदर्शनी

- गार्गीशरण मिश्र  ' मराल '  -

गुरुदेव ने अपने शिष्यों को एक कथा सुनाते हुए कहा - एक राजा ने अपने राज्य में कला की सार्थकता सिद्ध करने के लिए एक उत्कृष्ट प्रदर्शनी का आयोजन कराया। दूर - दूर से श्रेष्ठ कलाकार अपनी - अपनी कलाकृतियाँ लेकर आये। निर्धारित तिथि एवं समय पर राजा ने उस प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। राज्य के सभी नागरिकों को प्रदर्शनी देखने की राजाज्ञा हुई। सभी नागरिक बड़े चाव से प्रदर्शनी देखने गये। कलाकृतियाँ इतनी अच्छी थीं कि अनेक नागरिक, कलाकारों के मना करने पर भी उन्हें उठा उठाकर अपने घर ले आये। कुछ नागरिक प्रदर्शनी के प्रति उदासीन थे, किन्तु राजाज्ञा का पालन करने के लिए वे प्रदर्शर्नी देखने गये तो सही पर आँखों पर पट्टी बांधकर।
कलाकारों की शिकायत पर राजा को नागरिकों को दंडित कर कलाकारों की कलाकृतियाँ उन्हें वापिस दिलवायीं। आँखों पर पट्टी बाँधकर प्रदर्शनी देखने वाले नागरिक इसलिए खुश थे कि वे राजा के दंड से  बच गये। इस कथा का मर्म समझाते हुए गुरुदेव ने कहा - यह संसार ईश्वर द्वारा लगाई गई एक प्रदर्शनी है ताकि मानव उनकी कलाकृतियों को देखे और आनंदित हो। लेकिन संग्रह कर इन पर अपना अधिकार न जमाये। अन्यथा ईश्वर की आज्ञा से मौत आकर उससे इन्हें छीन लेगी। आँख पर पट्टी बाँधकर प्रदर्शनी देखने वाले वे लोग थे जो इस संसार को मिथ्या समझकर इससे दूर भागना चाहते हैं। यह विचार ईश्वर की प्रदर्शनी का स्वयं ईश्वर का अनादर करनेवाला है। यह संसार मानव की कर्मभूमि भी है। इसमें निष्काम भाव से कर्म करना - परोपकार करना, दीन - दुखियों की सेवा में, प्राणिमात्र के कल्याण में संलग्न होना ही मानव का कर्तव्य है। यही जीवनमुक्ति है, और यही ईश्वर की इच्छा भी।
  • 1436/ सरस्वती कालोनी, चेतीताल वार्ड जबलपुर (म.प्र.)
अलाव

  • - डॉ. रामशंकर चंचल -

बरसाती सर्द रात, सांय - सांय करते वीरान जंगल, ऊची पहाड़ियाँ और इन पहाड़ियों पर बसी झोपड़ियों में निवास करते भोले - भाले आदिवासी। बीस - पच्चीस झोपड़ियों का यह गाँव रोशन नगर कहलाता है। यद्यपि रोशनी के नाम पर इन सहृदय आदिवासियों ने सिर्फ चांद सूरज की रोशनी देखी है। पता नहीं, क्या सोच कर वर्षों से अंधेरे के श्राप में जी रहे  इस गाँव का नाम रोशननगर रख दिया। बरसती सर्द रातों में कुछ खेतों में ही दिखाई देती है रोशनी। वह रोशनी जिसे जलाकर करते हैं सारी रात खेतों की रखवाली। वह अलाव आग उन्हें रोशनी भी देती और ठंड से लड़ने का साहस भी। आज कड़कड़ाती ठंड से बचने के लिए मंगलिया ने अलाव जलाया और बैठ गया पास में अपना जिस्म गरमाने। दिन भर की मेहनत के बाद रात भर फिर जगना बहुत मुश्किल होता है। फिर भी मंगलिया बीड़ी जला कर धुआँ उड़ाते, जैसे तैसे नींद से लड़ रहा था। आखिर जब वह कुछ ज्यादा ही थकान महसूस करने लगा तो समीप रखी खटिया पर कुछ देर सुस्ताने के लिए लेट गया। पता नहीं कब नींद आ गई। इधर तूफानी हवा चली और अलाव की आग मंगलिया की झोपड़ी में लग गई। बस फिर क्या था, देखते ही देखते झोपड़ी भभक उठी। जिसे देख मंगलिया के बीबी - बच्चे चिल्लाने लगे। शोर से मंगलिया की नींद में खलल पड़ी वह उठा और देखा तो आँखें फटी की फटी रह गई। उसका घर जल रहा था। मंगलिया पागलों की तरह चिल्लाता हुआ दौड़ा पर वह झोपड़ी थी, आखिर कितना दम भरती? सब कुछ आग में भस्म हो गया। दिन - रात श्रम करके, मेहनत और ईमानदारी से बीवी - बच्चों का पोषण करने वाले सहृदय मंगलिया का सब कुछ स्वाहा हो गया था पर अगले दिन फिर मंगलिया काम पर जाने को तैयार था, उसे फिर से झोपड़ी जो बसानी थी।
  • गांधी बाड़ा, हमालपारा, वार्ड नं. 23 राजनांदगांव (छ.ग.)पिन कोड 491441। मो. 94077-60700

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