इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

रविवार, 9 जून 2013

नया इतिहास


  • कृष्‍णा श्रीवास्‍तव 'गुरुजी' 
अपलक निहारते
भर लेना चाहता हूं
सारी रश्मियां
आंखों में
तुम्हारा तेज .....
सूरज
    कर सकूं
    आलोकित,पथ
    तपस को फाड़
    दे सकूं नव संदेश
    कथित स्वर्ग के लिए
    सूरज
मैं सोचता हूं
क्या होगा उनका
जो तोड़ते हैं अनुबंध
भरते हैं दम
कृत्रिम ऊर्जा से .....
सूरज
    लूट कर भी
    भरा है कटोरा
    क्षणिक व्यवधान
    खत्म नहीं करती .... जिन्दगी
    चमकता है कनक तपकर ...
    सूरज
मेरे अंदर
संचारित रक्त
लिखेगी नया इतिहास
शाश्वत ... निरंतर
बहुत कुछ मिल रहा है .... तुमसे
सूरज
  • संकल्प, दिग्विजय कालेज रोड, जमातपारा, राजनांदगांव (छग.)

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