इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 22 जून 2013

थोकन बइठ ले


  • बिहारी साहू 
आगी अंगरा कस गा, जरत हवय भोंमरा थोकन बईठले
थोकन बईठ ले किसान, आगे नवा बिहान थोकन बईठले॥
    सावन भादो राँय - राँय, करे हस किसानी।
    कभु बईठ के खावस नहीं, जरगे जिनगानी॥
    बड़े बिहने साँझ कन तैं खाए जुड़ बासी।
    खेत - खार के पानी पिए फेर, अइस नई खाँसी॥
    टुटगे पट्टी रगरा तोर पटका होगे भोंगरा।
थोकन बइठ ले ...............................॥
    माड़ी भर के चिखला म दिन बुड़त ले कमाए।
    कतको थक जाथस फेर गोड़ नई लमाए॥
    चुटुर - चुटुर मच्छर चाबे, गिरय गजब पानी।
    भुनुन - भुनुन गोड़ हाथ म, गजब झुमय मांछी॥
    नांगर जोताये नंगरिहा, सुग्घर गावत हे ददरिया।
थोकन बइठ ले ..................................॥
    चना चाबे कस दाँत, कटर - कटर बाजे तोरे।
    नींदे धान खुमरी अऊ मनकप्पड़ ओढ़ के॥
    धान डोली ल निंदत, कभू हंसिया हा सटकगे।
    पांवे म केंदुवा अऊ ऐड़ी हा चटकगे॥
    रुप हवे करिया फेर दिखथे गजब बढ़िया।
थोकन बइठ ले ...................................॥
  • ग्राम - धारिया, तहसील - छुईखदान, जिला - राजनांदगांव (छ.ग.)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें