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शनिवार, 29 जून 2013

ओ सावन, ओ मनभावन



  • - धर्मेद्र गुप्त साहिल -
  •  
सरसा दे तृण - तृण, कण - कण।
पुलकित कर दे जगजीवन।।
ओ सावन, ओ मनभावन।
ओ सावन, ओ मनभावन।
खेतों में लहराते धान।
वसुधा को दें नवपरिधान।।
नव पल्लव, नव कुसुम- लता।
अवनि को दे रुप नया।
बन जाए भू नव दुल्हन।
ग्राम वधु गायें सावन।।
ओ सावन, ओ मनभावन।
ओ सावन, ओ मनभावन।
चहुं दिशि बरसे जीवनरस।
शुष्क हृदय हो जाए सरस।।
उर में भरे भाव परिमल।
दृग में उगे स्वप्न कोंपल।।
मृदु विचार हो, मृदु सृजन।
मृदु रचना हो, मृदु सृजन।।
ओ सावन, ओ मनभावन।
ओ सावन, ओ मनभावन।
बक - पिक- शिखी- हंस- दादुर।
सब क्रीड़ा को हों आतुर।।
जलधारा से रोमांचित।
दामिनी द्युति से हो कंपित
गायें मल्हार झूम के घन।
बूंदे नाचें छनन - छनन।।
ओ सावन, ओ मनभावन।
ओ सावन, ओ मनभावन।
  • पता - के - 3/ 10 ए, माँ शीतला भवन, गाय घाट, वाराणसी [उ. प्र.]

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