इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

शनिवार, 29 जून 2013

ओ सावन, ओ मनभावन



  • - धर्मेद्र गुप्त साहिल -
  •  
सरसा दे तृण - तृण, कण - कण।
पुलकित कर दे जगजीवन।।
ओ सावन, ओ मनभावन।
ओ सावन, ओ मनभावन।
खेतों में लहराते धान।
वसुधा को दें नवपरिधान।।
नव पल्लव, नव कुसुम- लता।
अवनि को दे रुप नया।
बन जाए भू नव दुल्हन।
ग्राम वधु गायें सावन।।
ओ सावन, ओ मनभावन।
ओ सावन, ओ मनभावन।
चहुं दिशि बरसे जीवनरस।
शुष्क हृदय हो जाए सरस।।
उर में भरे भाव परिमल।
दृग में उगे स्वप्न कोंपल।।
मृदु विचार हो, मृदु सृजन।
मृदु रचना हो, मृदु सृजन।।
ओ सावन, ओ मनभावन।
ओ सावन, ओ मनभावन।
बक - पिक- शिखी- हंस- दादुर।
सब क्रीड़ा को हों आतुर।।
जलधारा से रोमांचित।
दामिनी द्युति से हो कंपित
गायें मल्हार झूम के घन।
बूंदे नाचें छनन - छनन।।
ओ सावन, ओ मनभावन।
ओ सावन, ओ मनभावन।
  • पता - के - 3/ 10 ए, माँ शीतला भवन, गाय घाट, वाराणसी [उ. प्र.]

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें