इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

बुधवार, 26 जून 2013

रईस बेटा



  • परसराम चन्द्राकर

एक सुन्दर सा महलनुमा मकान जिसके आलीशान कमरों में कई बाहरी लोग रहते थे। यह मकान नगर के प्रसिद्ध डांक्टर राजपुरी का है। पास ही एक बड़ा सा बंगला है, जिसमें डां. राजपुरी स्वयं रहते हैं। किरायेदारोंं में एक किरायेदार गुरूजी है। वह यहां से चार मील दूर के गांव ढ़ोटमा में पढ़ाने जाता है। सतपाल गुरूजी और डॉ. राजपुरी में अच्छी दोस्ती पनप गई है।
यहां रहने से पहले सतपाल अपने पैतृक गाँव सुकली में रहता था। यहाँ उनके पूर्वज पिछले कई वर्षों से पीढ़ी दर पीढ़ी रहते आ रहे हैं। यहाँ एक भित्ती वाला घर है, जो काफी पुराना हो गया है, दीवारों में दरारे पड़ गई है। पहले इसमें सतपाल के पिताजी रहते थे। इस भित्ती के बगल में सर्व सुविधायुक्त मकान है। जिसे सतपाल ने नौकरी के पैसों से बनवाया है। सतपाल के शहर चले जाने पर माता - पिता  गाँव में सतपाल के बनवाये घर में ही रह रहे थे। पुराना घर अभी भी अपना अस्तित्व कायम रखा था। घर की चमक - दमक उड़ चुका था। अब वहाँ कोई दीप जलाने भी नहीं आता।
मास्टर के पिताजी खेतराम ने इस घर को बनवाया था। कड़ी मेहनत और ईमान के पैसे लगे थे, इस गृह को बनवाने में। इस कुटीर का एक स्वप्र आशा लिए था वह कि खेतराम के मेहनती हाथ - पैरों का स्पर्श पाकर वह धन्य हो जायेगा। आँधी - तूफान, वर्षा और सर्दी - गर्मी को अकेला ही झेल रहा था। क्षण भर के लिए खेतराम का संयोग पाने को। जिस घर में खेतराम रह रहा है उसे उसके बेटे ने अपनी कमाई से बनवाया है। उस पुराने टूटते घर को देख स्नेहासिक्त से उसका अंतर्मन व्यथित सा हो जाता है। मौन पुकार उठता है - मैं कैसे बदल गया, क्या मैं भोगी हो गया ? मुझे महल का सुख नहीं चाहिए । मैं विलास नहीं चाहता, मुझे मेरी कुटिया की अधढंकी छाया ही चाहिए।
भावनाओं की प्रबलता को आंकना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य ही है। अत्यंत दुष्कर है संवेगों का मापन। जब अपने हाथों की अपने भाल के श्रम कणों को बहाकर बनाई हुई तुच्छ से तुच्छ वस्तु हमसे छिन जाये तो हमें अपार दुख होता है। जड़ वस्तु भी तो अपने स्नेह से हमें बंधन में बांधे रखती है। टूटती आस लिए उत्साह से भरे हुए बौने काले खेतराम की याद में डूबा रहता था, वह लकड़ी और मिटï्टी से बनी कुटिया। वह दिन एक बार फिर आ जाये कि खेतराम टूटे छप्परों और दरार पड़े दीवारों के बीच वर्षा की अंधेरी रात में जागते - जागते रैन बिता दें।
निरंतर दिन का रात, रात का दिन में बदलना। समय तो कभी नहीं ठहरता। यादों का भूलना और समय गुजरने का क्रम संग - संग चलता रहता है। शायद खेतराम अपने जीवन के कंटकपथ में साथ देने वाले झोपड़ी की छत्रछाया को भूल गया था।
खेतराम के पुत्र सतपाल को डॉ. का संग मिल गया था। विद्यालय में पढ़ाई कराने के बाद शाम को सैर सपाटे खाने के वक्त आधुनिक ड्रिंक और फिर देर रात तक गप्पे हांकना उसकी आदत हो गयी थी। विद्यालय में पढ़ाने के काम में भले ही टाल - मटोल हो, तामझाम में कमी नहीं रखते। सतपाल के जीवन की पहिया पहले से ही दिशाहीन हो गयी थी। रईसों के संग बैठक उठक संगति का प्रभाव तो पड़ता ही है। सतपाल को लगता कि उसका जीवन बड़ा सुखमय है और अपनी अलग पहचान लिए मस्तानी मजों से भरा है। पैसा है, रईसों के बीच मान बढ़ाई है तो आनंद रहेगा ही। उसे अपने कर्महीनता का ज्ञान नहीं रहा। दिशाहीन हो गया था, श्रमसाध्य बाप के बेटे की जीवन यात्रा।
गर्मी के दिन थे। बच्चों की परीक्षाएं शुरू हो गई थी। भयानक गर्मी के दिन में खेतराम अपने लाड़ले सतपाल की सुध लेने और लकड़ी , दाल , चांवल पहुंचाने चल पड़े। घर में पत्नी ने सम्हल कर जाने और दूसरे दिन तक निश्चित रूप से वापस आने का आग्रह किया है। उसने बेटे के लिए भूना चना पोटली में बांध खेतराम को दी। एक बाप बेटे के लिए बड़े ही उमंगें लेकर यात्रा कर रहा था। बस स्टाप पर उतरा और बेटे को देखने, कुशलता पूछने को आतुर हो नगर की ओर बढ़ गया। खेतराम की वेशभूषा एक किसान की तरह था। देखने में बिलकुल भोला - भाला, सह्रïदय। जिस गली से वह गुजर रहा था, वहीं एक तरूणी पानी भर रही थी। उसने पूछा - मास्टर सतपाल का घर किधर है? उसके घर का रास्ता बता दे बेटी।
तरूणी - पहले आप ये बतायें कि आप कौन है ? तब पता बताऊंगी।
- बेटी, मैं सतपाल का पिता हूं।
तरूणी ने अपने दांतों तले अंगुली दबा ली। कहा - सतपाल तो बड़े लोगों की बस्ती में रहता है, क्या आप वास्तव में उनके पिता हैं ?
- हां बेटी, हां।
- मगर आप तो एकदम उनके विपरीत लगते हैं। खैर, आपका बेटा उस बाग वाले मकान के बगल में रहता है।
खेतराम को कुछ समझ नहीं आया।  वह आगे बढ़ गया। उसके सिर पर लकड़ी का बोझ एवं बाहों में दाल - चांवल के थैले लटके थे। मुख मण्डल से सीकर टपक रहा था। खेतराम को उस बंगले के बाहर कुछ लोग बैठे हुए दिखाई दिए। वह वहीं जाने लगा तभी एक ने कहा - रूको, तुम कौन हो ?
- मैं सतपाल का पिता हूं। सामान पहुंचाने आया हूं। खेतराम ने कहा।
समूह में बैठे लोगों में से दूसरे ने कहा - देख, वह बुढï्ढा स्वयं को सतपाल का पिता बता रहा है। वहीं पर डां. और सतपाल भी बैठे थे। डां. ने उसके कान में फुसफुसाकर पूछा - क्या सचमुच वह बुढï्ढा तुम्हारा पिता है ?
तब तक बुढï्ढा उन लोगों के निकट पहुंच चुका था। सतपाल ने कहा - क्या डां. आप भी क्या सोच लेते हो ? मेरे पिता को तुमने देखा नहीं है। यह तो हमारा नौकर है। सामान पहुंचाने आया है।
दबी आवाज खेतराम के कान तक पहुंच चुकी थी। पुत्र के ऐसे कठोर शब्द को सुनकर उसके आत्म स्वाभिमान को गहराघात पहुंचा। आंख से आंसू टपक पड़े। उससे कुछ कहा नहीं गया। उसने लकड़ी के गटï्ठे को वहीं पर पटका और थैली को उतार कर रख दिया। कहा - बेटा, तुम्हारे पिता ने यह सामान भेजा है। इसे रखो, और वह वहीं से लौटने लगा। तभी सतपाल ने कहा - पानी पी कर तो जाओ।
- नहीं बेटा, जिसका पानी उतर गया हो वह पानी क्या पीये।
और लौट गया अपने गांव की ओर।
घर पहुंचा तो पत्नी ने पूछा - कैसा है मेरा सतपाल।
- पूछो मत। वह बहुत बड़ा आदमी बन गया है। वह काफी सुखी है। उसके पास नौकरों की कमी नहीं।
सतपाल के व्यवहार ने खेतराम की आत्मा को तार - तार कर दिया था। वह चाहकर भी अपने पुत्र के व्यवहार को किसी के समक्ष नहीं रख पा रहा था। वह भीतर ही भीतर घुलने लगा।
एक दिन सतपाल गाँव आया। वह खेतराम के पैर छुने झुका तो खेतराम ने पैर को खींचते हुए कहा - नौकरों के पैर नहीं छुआ करते।
सतपाल अपने किये पर पश्चाताप करना चाहता था। परन्तु उसने अपने पिता के साथ कुछ ऐसा व्यवहार किया था जो खेतराम की आत्मा में घर कर गया था। सतपाल ने गिड़गिड़ा कर माफी मांगी मगर खेतराम से माफी नहीं दिया जा सका। भीतर की पीड़ा ने उसे इतना व्यथित कर दिया था कि उसमें शारीरिक कमजोरी आ गयी थी और एक दिन वह धड़ाम से गिर गया। बेहोशी एक घण्टे बाद टूटी तो पत्नी ने फिर उससे पूछा - क्या बेहोश हो गये।
- उम्र हो गयी है न। बोझ ढो - ढो कर शरीर थक गया है। अब बोझ ढोने की ताकत नहीं रह गयी है। उसने सच्चाई को छिपा दिया।
उस दिन से खेतराम बीमार रहने लगा। अब वह डंडे का  सहारा लेकर चलने लगा था।
आज वह घर के बाहर खड़ा था। कबूतरों का एक झुण्ड उस पुरानी कुटिया में उतरा। खेतराम एकाएक उस झोपड़ी की ओर बढ़ गया। वहां पहुंचते ही उसके हाथ से डंडा छूट गया और खेतराम वहीं पर गिर गया। एक बच्चे ने घर आकर बताया कि बाबा पुराने घर में गिरे पड़े हैं।
सुनकर सतपाल अपनी मां के साथ उस मकान की ओर दौड़ा। उसने देखा - खेतराम पड़ा था- सुखासीन, चिरशांत ....।
  • पता - मु. - रेंगाबोड़ [ महली ], जिला - कबीरधाम [ छत्तीसगढ़ ]

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें