इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शुक्रवार, 14 जून 2013

कुसियार माड़े हे



  •  डा जीवन यदु
दीया के खाल्हे जतका अंधियार माढ़े हे ।
बस ओतके मा दीया के संसार माढ़े हे ।।

मोर आगू मा भभके संगी ! जिनगी के होले,
पन तोर आगू होले के तिहार माढ़े हे ।

वो मनखे जब मोला मिलथे, तब अइसे लगथे,
मोर आगू मा आजे के अखबार माढ़े हे ।

हाँ मा हाले मुड़, कै ना मा, पन अइसे हाले,
पगड़ी ऊपर जइसे कुकरी - गार माढ़े हे ।

पेट - बिकारी के झंझट के बीच  मं तोरे सुरता,
बॉंस के जंगल मा जइसे कुसियार माढ़े हे ।

वो कइसे हरियर चारा के ले सकही सुवाद,
जे बोकरा के चेथी मा तलवार माढ़े हे ।

  • दाऊ चौरा , खैरागढ़, जिला - राजनांदगांव (छ.ग.)

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