इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

गुरुवार, 27 जून 2013

दिन सँउर जाही



- आत्माराम कोशा '' अमात्य '' -

ककरो चेहरा ल नजर भर के देख ले
खुसी तँउर जाही तोर दिन सँउर जाही।

सँइत कोई बपुरी हा उंचकपारी हो
दुख बिसर जाही तोर दिन सँउर जाही।

जिनगी म दुखे - दुख हे, प्रेम के भूखे - भूख हे
कतका लुकाही ? तोर दिन सँउर जाही।

नजर म झन बिकार रहे, सतधरमी बिचार रहे
राहय न अऊ कुछु काँही ,तोर दिन सँउर जाही।

दुनिया के अड़बड़ ताना हे, नजरों ह गजब सियाना हे
कतको तोला भरमाही, तोर दिन सँउर जाही।

दुनिया के भाव ल देख झन, गलती ल कभू सरेख झन
आत्मा ल ठंडक पहुँचाही, तोर दिन सँउर जाही।

ककरो चेहरा ल नजर भर के देख ले
खुसी तँउर जाही, तोर दिन सँउर जाही।

  • पुराना गंज चौक, राजनांदगांव  (छ.ग.) मो. 81036- 60394

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