इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 29 जून 2013

छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य नाचा के पुरखा : मंदराजी दाऊ




-  कुबेर  -
कुबेर

लोकनाट्य ह वोतकच पुरातन आय जतका मनुष्य के सामाजिक जीवन। सत्य अउ सनातन के खोज म लोक कलाकार मन जउन सपना देखथें अउ वोला मंच म अभिनय के माध्यम ले प्रगट करथे विही  लोकनाट्य ल हम नाचा कहिथन। नाचा कलाकार मन लोक - जीवन से जुड़े अपन अनुभव ल जउन सरलता, सहजता अउ सुंदरता ले प्रस्तुत करथें विही ह नाचा के संप्रेषणीयता के राज आय। एकरे ले नाचा म सामूहिक सम्मोहन के प्रभाव पैदा होथे। देखइया मन नाचा के मोहनी म अतका मोहा जाथे कि रात भर अपन जघा ले टसमस नइ होवंय। लोक संस्कृति के सतरंगी चमक, मनमोहक खुशबू अउ लोकहित के भाव ह नाचा के आत्मा आय। नाचा के कोनों संवाद ह लिखित म नइ रहय। कलाकार मन भुक्त संवेदनात्मक आवेग के भावात्मक ताकत से उत्पन्न विलक्षण हाजिरजवाबी द्वारा प्रसंग अनुसार अपन संवाद ल खुदे बोलत जाथें। इंखर संवाद म हंसी - मजाक तो रहिबेच करथे, समाज के आर्थिक, धार्मिक अउ सामाजिक शोषण - जनित दुख - पीरा ऊपर करारा ब्यंग घला रहिथे।
छत्तीसगढ़ के नाट्य परंपरा ह संसार के सबले पुरातन नाट्य परंपरा आय। रामगढ़ के पहाड़ी म स्थित रंगशाला ल दुनिया के सबले जादा जुन्नेट रंगशाला माने जाथे। फेर नाचा के जउन सरुप ल आज हम देखथन वो ह जादा पुरातन नो हे। पहिली खड़े साज के चलन रिहिस हे। जेवन करके गाँव के कोनो चंउक म सब सकला जावंय। कलाकार मन मुंह मा छुही - कोयला पोत के हाजिर हो जावंय। तबलची, मंजीरहा, चिकरहा, मसालची अउ परी सब मिल के खड़े - खड़े ब्रहा्रानंद अउ कबीर के निरगुनिया  भजन गावंय। गम्मत नइ होवय। कोनो संगठित नाचा पार्टी नइ रहय। नाचा पार्टी ल संगठित करके वोला आज वाला सरुप देवइया महान लोक - रंगकर्मी, संगीतकार, सुंदर सामाजिक शुचिता अउ सौहाद्र के स्वप्र - द्रष्टा, समाज सुधारक अउ नाचा बर अपन तन - मन - धन ल अर्पित करइया महान विभूति के नाम रिहिस - दाऊ दुलार सिंह साव जउन ल हम मंदराजी दाऊ के नाम से जानथन।
मदराजी दाऊ के जन्म 1 अप्रैल 1911 ई. में राजनांदगांव ले सात किलोमीटर दुरिहा रवेली गाँव के संपन्न मालगुजार परिवार म होय रिहिस। पिताजी के नाव श्री रामाधीन साव  अउ माताजी के नाव श्रीमती रेवती बाई साव रिहिस। इंखर प्राथमिक शिक्षा कन्हारपुरी म होइस। बचपनेच ले इंखर रुचि गाना - बजाना म रिहिस। कहावत हे - होनहार बिरवान के होत चीकने पात। गाँव म कुछ लोक कलाकार रिहिन। इंखरे संगत म पड़ के बचपनेच म ये मन तबला अउ चिकारा बजाय बर सीख गें। वो समय इहां हारमोनियम के नामोनिशान नइ रिहिस।
माता - पिता के इच्छा रिहिस कि बेटा ह पढ़ - लिख के मालगुजारी ल संभालय, फेर बेटा के मन तो नाचा के सिवा अउ कुछू म रमेच नहीं। बाप ल ये सब चिटको नइ सुहावय। बेटा ल हाथ से निकलत देख के वोला फिकर होय लगिस। बेटा ल बांध के रखे खातिर अब वोला एकेच उपाय दिखिस। चौदह साल के बालपन म ही राम्हिन बाई नाव के सुंदर कन्या के संग दुलार सिह के बिहाव कर दिन। फेर मंदराजी के मूड़ म तो नाचा के भूत सवार रहय। दुनियादारी म वो कहाँ बंधने वाला रिहिस ?
दुनिया के कोनो माया - मोह ह मंदराजी दाऊ ल नाचा ले अलग नइ कर सकिन। एक समय वो ह नाचा बर नरियर झोंक डरे रहय। घर म बेटा ह बीमार पड़े रहय। भगवान ल परछो लेना रिहिस। विही दिन बीमार बेटा के सांस टूट गे। पुत्र  - सोग ले बढ़के दुनिया म अउ कोनों दुख नइ होवय, फेर वो तो रिहिस ए युग के राजा जनक वीतरागी। बेटा के लहस ल छोड़ के पहुंचगे नाचा के मंच म। रात भर नाचा होइस। देखइया मन रात भर मजा लूटिन। मदरांजी के मन के दुख ल कोई नइ जान सकिन, न देखइया मन, न संगवारी कलाकार मन। बिहिनिया नाचा खतम होइस। मंदराजी के दूनों आँखी ले तरतर - तरतर आँसू बोहय लगिस। संगवारी मन चकरित हो गें। अइसन रिहिस मदराजी दाऊ ह।
दुलार सिंह ले मंदराजी बने के घला बड़ रोचक किस्सा हे। बचपन म बड़े पेट वाला हट्टा - कट्टा दुलार सिंह ह अंगना म खेलत रहय। तुलसी - चवरा म वइसने एक ठन पेटला मूर्ति ओधे रहय जउन ह मंदरासी मन सरिख दिखय। नाना ह विही ल देख के बालक ल कहि दिस - मदरासी। काकी - भउजी मन ल घला इही नाम ह भा गे अउ दुलार सिंह ह बनगे मदरासी। इही मदरासी ह सुधरत - सुधरत हो गे मंदराजी अउ जहरित हो गे जग म।
नाचा अउ मंदराजी दाऊ अब एक - दूसर के पहिचान बन गें। समाज के कुरीति अउ अंगरेज के गुलामी वोकर मन ल निसदिन कचोटय। मंदराजी दाऊ ह इंखर से लड़े खातिर नाचा ल हथियार बना लिस। अब वो ह नाचा ल अपन मनमाफिक रुप देय बर भिड़गे। 1927 - 28 ई. म वो ह नाचा के प्रसिद्ध कलाकार मन ल जोड़ के नाचा पार्टी बनाय के उदिम शुरु कर दिस। खल्लारी के प्रसिद्ध परी नारद निर्मलकर, प्रसिद्ध गम्मतिहा लोहरा भर्रीटोला के सुकालू ठाकुर अउ खेरथा अछोली के नोहर दास कन्हारपुरी राजनांदगांव के तबलची राम लाल निर्मलकर अउ चिकरहा के रुप म खुद। पांचों झन मिल के नाचा पार्टी के गठन करिन। इही ह पहिली संगठित नाचा पार्टी बनिस।
मंदराजी दाऊ के नांव अब छत्तीसगढ़ म जहरित हो गे। 1930 ई. म वो ह संगवारी मन संग कलकत्ता जा के हारमोनियम लाइस। नाचा म अब पहिली बार हारमोनियम बजे लगिस। नाचा के रंग - ढंग ल दाऊ जी ह अब चुकता बदले ल भिड़गें। नाचा के मंच म अब चंदेवा लगे के शुरु हो गे। बजनिहा मन बर बाजवट माढ़े लगिस। मशाल के जघा गियास बत्ती [पेट्रोमेक्स] जले लगिस। खड़िया अउ हरताल के जघा स्नो पाउडर आ गे। ब्रहा्रानंद अउ कबीर के निरगुनिया भजन के जघा भाई रे तंय छुआ ल काबर डरे अउ तोला जोगी जानेव रे भाई जइसे गीत बजे लगिस आगू चल के फिल्मी गीत घला आगे। गम्मत होय लगिस अउ इही गम्मत मन म समाज के ढोंग ल उजागर करे के उदिम अउ देश के आजादी होय के बात होय लगिस। नाचा अबरात के दस बजे ले बिहिनिया के होवत ले होय लगिस।
जनता नाचा के दिवानी हो गे। दिन डुबतहच जघा पोगराय बर बोरा - दरी जठे के शुरु हो जाय। दुरिहा - दुरिहा के आदमी गाड़ी - खांसर म जोरा - जोरा के आय। नाचा के लोकप्रियता के हिसाब रायपुर म सन् 50 - 51 म एकर प्रदर्शन से लगाय जा सकथे। डेढ़ महीना तक रोज नाचा होइस। नाचा के समय जम्मों टाकीज मन बंद हो जावंय। टाकीज वाले मन थर खा गें।
मंदराजी ह नाचा अउ नाचा कलाकार मन बर अपन सब कुछ ल होम कर दिस। अंत म सौ एकड़ के मालिक ये दधीचि के पास हारमोनियम के सिवा अउ कुछू नइ बचिस। दाऊ जी ह एक बात हरदम कहय - दुनिया म धन कमाना सरल हे, नाम कमाना कठिन हे। दुनिया म सबो खाली हाथ आथें अउ खालिच् हाथ जाथें, फेर महापुरुष मन अपन नांव ल दुनिया म छोड़ जाथें। उंखर कर्म के महक ह सदा - सदा के लिये समाज म बस जाथे।
दाऊ मंदराजी 24 सितंबर 1984 ई. म ये दुनिया ले बिदा हो गे।
वोकर जन्म स्थान रवेली म वोला भक्ति भाव अर्पित करे बर हर साल 1 अप्रेल के दिन लोक कलाकार मन के मेला लगथे। राज्य सरकार ह वोकर सम्मान म लोक कलाकार मन बर दो लाख रुपिया के मंदराजी सम्मान देथे।
  • पता - व्याख्याता, शास. उच्च. माध्य. विद्या.कन्हारपुरी जिला - राजनांदगांव [छ.ग.]

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