इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

गुरुवार, 20 जून 2013

गहरी खाई

  • दिनेश चौहान 
हालांकि वह सेठ का बहुत पुराना मुलाजिम था। पर उसे कोई रहम नहीं आया। जब उसने उस  ईमानदार मुलाजिम को बिना सूचना के नौकरी से अलग कर दिया। दरअसल उसके एक भाई को पुलिस ने एक चोरी के इल्जाम में पकड़ लिया था।
- सेठ, चोरी मेरे भाई ने की है। वह भी पुलिस के मुताबिक किसी दूसरे शहर में। उसके अपराध की सजा अदालत उसे सुनाएगी, पर आप मुझे किस अपराध में नौकरी से अलग कर रहे हैं ?
- अरे भाई मुझे तुमसे बहस नहीं करना है, मैं चोर के भाई को अपने यहां नौकरी में नहीं रख सकता।
मुलाजिम ने अंतिम प्रयास के रूप में एक उदाहरण और प्रस्तुत करते हुए कहा - सेठ आपको भी पता है। बनवारीलाल के बेटे ने एक खून कर दिया था, पर सरकार ने तो उसे नौकरी से अलग नहीं किया। अलबत्ता उसका बेटा जेल में सजा काट रहा है।
- तो जाओ न, सरकारी नौकरी ढूंढ लो। मेरा सिर क्यों खा रहे हो।
यह कहकर सेठ ने सिक्यूरिटी गार्ड को इशारा कर दिया कि उसे धक्का देकर बाहर कर दे। अब वह बेरोजगार मुलाजिम भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त समानता के मौलिक अधिकार में अपना वजूद खोज रहा है पर वह उसे असमानता की गहरी खाई में कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं हो रहा है।
  • पता - शीतला पारा, नवापारा, राजिम (छग)

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